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मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

बुद्धि से बड़ा कोई भी बल नहीं

कहानी : बुद्धि से बड़ा बल भी नहीं



एक गुफा में एक बड़ा ताकतवर शेर रहता था। वह प्रतिदिन जंगल के अनेक जानवरों को मार डालता था। उस वन के सारे जानवर उसके डर से काँपते रहते थे। एक बार जानवरों ने सभा की। उन्होंने निश्चय किया कि शेर के पास जाकर उससे निवेदन किया जाए। जानवरों के कुछ चुने हुए प्रतिनिधि शेर के पास गए। जानवरों ने उसे प्रणाम किया।

फिर एक प्रतिनिधि ने हाथ जोड़कर निवेदन किया, ‘आप इस जंगल के राजा है। आप अपने भोजन के लिए प्रतिदिन अनेक जानवरों को मार देते हैं, जबकि आपका पेट एक जानवर से ही भर जाता है।’

शेर ने गरजकर पूछा-‘तो मैं क्या कर सकता हूँ?’

सभी जानवरों में निवेदन किया, ‘महाराज, आप भोजन के लिए कष्ट न करें। आपके भोजन के लिए हम स्वयं हर दिन एक जानवर को आपकी सेवा में भेज दिया करेंगे। आपका भोजन हर दिन समय पर आपकी सेवा से पहुँच जाया करेगा।’

शेर ने कुछ देर सोचा और कहा- ‘यदि तुम लोग ऐसा ही चाहते हो तो ठीक है। किंतु ध्यान रखना कि इस नियम में किसी प्रकार की ढील नहीं आनी चाहिए।’

इसके बाद हर दिन एक पशु शेर की सेवा में भेज दिया जाता था। एक दिन शेर के पास जाने की बारी एक खरगोश की आ गई। खरगोश बुद्धिमान था। उसने मन-ही मन सोचा- ‘अब जीवन तो शेष है नहीं। फिर मैं शेर को खुश करने का उपाय क्यों करुँ? ऐसा सोचकर वह एक कुएँ पर आराम करने लगा। इसी कारण शेर के पास पहुँचने में उसे बहुत देर हो गई।’

खरगोश जब शेर के पास पहुँचा तो वह भूख के कारण परेशान था। खरगोश को देखते ही शेर जोर से गरजा और कहा, ‘एक तो तू इतना छोटा-सा खरगोश है और फिर इतनी देर से आया है। बता, तुझे इतनी देर कैसे हुई?’


खरगोश बनावटी डर से काँपते हुए बोला- ‘महाराज, मेरा कोई दोष नहीं है। हम दो खरगोश आपकी सेवा के लिए आए थे। किंतु रास्ते में एक शेर ने हमें रोक लिया। उसने मुझे पकड़ लिया।’

मैंने उससे कहा- ‘यदि तुमने मुझे मार दिया तो हमारे राजा तुम पर नाराज होंगे और तुम्हारे प्राण ले लेंगे।’ उसने पूछा-‘कौन है तुम्हारा राजा?’ इस पर मैंने आपका नाम बता दिया।

यह सुनकर वह शेर क्रोध से भर गया। वह बोला, ‘तुम झूठ बोलते हो।’ इस पर मैंने कहा, ‘नहीं, मैं सच कहता हूँ तुम मेरे साथी को बंधक रख लो। मैं अपने राजा को तुम्हारे पास लेकर आता हूँ।’

खरगोश की बात सुनकर दुर्दांत शेर का क्रोध बढ़ गया। उसने गरजकर कहा, ‘चलो, मुझे दिखाओ कि वह दुष्ट कहाँ रहता है?’

खरगोश शेर को लेकर एक कुँए के पास पहुँचा। खरगोश ने चारों ओर देखा और कहा, ‘महाराज, ऐसा लगता है कि आपको देखकर वह शेर अपने किले में घुस गया।’

शेर ने पूछा, ‘कहां है उसका किला?’

खरगोश ने कुएँ को दिखाकर कहा, ‘महाराज, यह है उस शेर का किला’

खरगोश स्वयं कुएँ की मुँडेर पर खड़ा हो गया। शेर भी मुँडेर पर चढ़ गया। दोनों की परछाई कुएँ के पानी में दिखाई देने लगी। खरगोश ने शेर से कहा, ‘महाराज, देखिए। वह रहा मेरा साथी खरगोश। उसके पास आपका शत्रु खड़ा है।’

शेर ने दोनों को देखा। उसने भीषण गर्जन किया। उसकी गूँज कुएँ से बाहर आई। बस, फिर क्या था! देखते ही देखते शेर ने अपने शत्रु को पकड़ने के लिए कुएँ में छलाँग लगा दी और वहीं डूबकर मर गया।

(साभार: पंचतंत्र की शिक्षाप्रद कहानियां, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

बुधवार, 23 नवंबर 2011

पंचतंत्र की कहानियां

सच्चा शासक


कंचन वन में शेरसिंह का राज समाप्त हो चुका था पर वहां बिना राजा के स्थिति ऐसी हो गई थी जैसे जंगलराज हो जिसकी जो मर्जी वह कर रहा था। वन में अशांति, मारकाट, गंदगी, इतनी फैल गई कि वहां जानवरों का रहना मुश्किल हो गया। कुछ जानवर शेरसिंह को याद कर रहे थे कि “जब तक शेरसिंह ने राजपाट संभाला हुआ था सारे वन में कितनी शांति और एकता थी। ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन यह वन ही समाप्त हो जाएगा और हम सब जानवर बेघर होकर मारे जाएंगे।” गोलू भालू बोला- “कोई न कोई उपाय तो करना ही होगा- क्यों न सभी कहीं सहमति से हम अपना कोई राजा चुन लें जो शेरसिंह की तरह हमें पुन: एक जंजीर में बांधे और वन में एक बार फिर से अमन शांति के स्वर गूंज उठे।” सभी गोलू भालू की बात से संतुष्ट हो गए। पर समस्या यह थी कि राजा किसे बनाया जाए? सभी जानवर स्वयं को दूसरे से बड़ा बता रहे थे।
सोनू मोर बोली- “क्यों न एक पखवाड़े तक सभी को कुछ न कुछ काम दे दिया जाए तो अपने काम को सबसे अच्छे ढंग से करेगा उसे ही यहां का राजा बना दिया जाएगा।” सोनू स्वीटी की बात से सहमत हो गए और फिर सभी जानवरों को उनकी योग्यता के आधार पर काम दे दिया गया। बिम्पी लोमड़ी को मिट्टी हटाने का काम दिया गया तो भोलू बंदर को पेड़ों पर लगे जाले हटाने का, सोनी हाथी को पत्थर उठाकर एक गङ्ढे में डालने का काम सौंपा गया था और मोनू खरगोश को घास की सफाई की।
जब एक पखवाड़ा बीत गया तो सभी जानवर अपने-अपने कार्यों का ब्यौरा लेकर एक मैदान में एकत्रित हो गए। सभी जानवरों ने अपना काम बड़ी सफाई और मेहनत से पूरा किया था। सिर्फ सोनू हाथी था जिसने एक भी पत्थर गङ्ढे में नहीं डाला था।
अब एक समस्या फिर खड़ी हो गई कि आखिर किसके काम को सबसे अच्छा माना जाए। बुध्दिमान मोनू खरगोश ने युक्ति सुझाई “क्यों न मतदान करा लीया जाए, जिसे सबसे ज्यादा मत मिलेंगे उसे ही हम राजा चुन लेंगे।”
अगले दिन सुबह-सुबह चुनाव रख लिया गया और एक बड़े मैदान में सभी पशु-पक्षी मत देने के लिए उपस्थित हो गए। मतदान समाप्त होने के एक घंटे पश्चात मतों को गिनने का काम शुरु हुआ। यह क्या! सोनू हाथी गिनती में सबसे आगे चल रहा था और जब मतों की गिनती समाप्त हुई तो सोनू हाथी सबसे ज्यादा मतों से विजयी हो गया। सभी जानवर एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे।
तभी पक्षीराज गरूण वहां उपस्थित हुए और उपस्थित सभी जानवरों को सम्बोधित करते हुए बोले- ‘सोनू हाथी प्रतिदिन पत्थर लेकर गङ्ढे तक जाता था किंतु जब उसने देखा कि उस गङ्ढे में मेरे अंडे रखे हुए हैं तो वह पत्थरों को उसमें न डालकर पास ही जमीन पर एकत्रित करता रहा। सोनू ने अपने राजा बनने के लालच को छोड़ एक जीव को बचाना ज्यादा उपयोगी समझा। उसकी इस परोपकार की भावना को देखकर हम पक्षियों की भावना को देखकर हम पक्षियों ने तय किया कि जो अपने लालच को छोड़कर दूसरों के सुख-दु:ख का ध्यान रखें वही सच्चे तौर पर शासक बनने का अधिकारी है और चूंकि वन में पक्षियों की संख्या पशुओं से अधिक थी इसलिए सोनू हाथी चुनाव जीत गया।’

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011



दशहरे का मेला —पूर्णिमा वर्मन
मौसम बदल रहा था और हल्की-हल्की ठंड पड़ने लगी थी। इसी बीच न जाने कैसे छोटू बीमार पड़ गया। मुहल्ले के सारे बच्चों में उदासी छा गई। सबका दादा और शरारतों की जड़ छोटू अगर बिस्तर में हो तो दशहरे की चहलपहल का मज़ा तो वैसे ही कम हो जाता। ऊपर से अबकी बार मम्मियों को न जाने क्या हो गया था।
रमा आंटी ने कहा कि अबकी बार मेले में खर्च करने के लिए बीस रूपए से ज़्यादा नहीं मिलेंगे, तो सारी की सारी मम्मियों ने बीस रूपए ही मेले का रेट बाँध दिया। मेला न हुआ, आया का इनाम हो गया। बीस रूपए में भला कहीं मेला देखा जा सकता था? यही सब सोचते-सोचते हेमंत धीरे-धीरे जूते पहन रहा था कि नीचे से कंचू ने पुकारा -
'हेमंत, हेमंत चौक नहीं चलना है क्या?' हेमंत और सोनू भागते हुए नीचे उतरे और जल्दी से मोटर की ओर भागे जहाँ बैठा हुआ स्टैकू पहले ही उनका इंतज़ार कर रहा था।
दुर्गापूजा की छुटि्टयाँ हो गई थी। मामा जी के घर के सामने वाले पार्क में हर शाम को ड्रामा होता था। हेमंत, कंचू और सोनू इन छुटि्टयों में शाम को मामा जी के यहाँ जाते थे, जहाँ वे ममेरे भाई स्टैकू के साथ ड्रामा देखते, घूमते फिरते और मनोरंजन करते।
हर बार सबके नए कपड़े सिलते और घर भर में हंगामा मचा रहता। अबकी बार कंचू ने गुलाबी रंग की रेशमी फ्राक सिलाई थी और ऊँची एड़ी की चप्पलें ख़रीदी थीं। आशू और स्टैकू मिलकर बार-बार उसकी इस अलबेली सजधज के लिए उसे चिढ़ा देते।
उधम और शरारतों की तो कुछ बात ही मत पूछो जब सारे भाई बहन इकठ्ठे होते तो इतना हल्ला-गुल्ला मचता कि गर्मी की छुटि्टयों की रौनक भी हल्की पड़ जाती। इस साल भी बच्चों का वही नियम शुरू हो गया था। शाम को वे लोग शहर में लगी रंगीन बत्तियों की रौनक देखते हुए चौक पहुँचे और घर में घुसते ही खाने की मेज पर जम गए। मामी ने खाने का ज़बरदस्त इंतज़ाम किया था। आशू के पसंद की टिक्कियाँ, कंचू की पसंद के आलू और स्टैकू की पसंद की गर्मागर्म चिवड़े-मूँगफली की खुशबू घर में भरी थी। रवि की पसंद के सफ़ेद रसगुल्ले मेज़ पर आए तो सबको रवि की याद आ गई।
'रवि ओ रवि, नाश्ता करने आओ'
मामी ने ज़ोर से आवाज़ दी।
"आया माँ" रवि की आवाज़ सबसे ऊपर वाले कमरे से आई।
"अरे ये रवि ऊपर क्या कर रहा है? कंचू ने अचरज से पूछा।
मामी ने बताया कि अबकी बार नाटक में उसने भी भाग लिया है इसलिए वो ऊपर कार्यक्रम की तैयारी और रिहर्सल में लगा हुआ है।
थोड़ी देर में पूरा मेकअप लगाए हुए टींकू नीचे उतरा तो सभी उसे देखकर खिलखिला कर हँस दिए। टींकू ने शरमा कर मुँह फेर लिया। "हमें अपने नाटक में नहीं बुलाओगे" हेमंत ने पूछा।
"तो क्या तुम्हें हमारे नाटक के टिकट नहीं मिले? " रवि ने अचरज से कहा, "टिकट तो सारे स्टैकू के पास थे।"
"अरे हाँ जल्दी-जल्दी में टिकट मैं तुम्हें देना भूल गया, "स्टैकू ने गिनकर तीन टिकट आशु, सोनू और कंचू के लिए निकाले। सोनू ने पूछा, "बिना टिकट नाटक देखना मना है क्या?" रवि ने कहा "मना तो नहीं है लेकिन कुर्सियाँ हमने टिकट के हिसाब से लगाई हैं।

"अरे तुम लोगों का अभी तक नाश्ता नहीं ख़त्म हुआ, देखो, रामदल के बाजे सुनाई पड़ने लगे। नाश्ता ख़त्म करे बिना घूमने को नहीं मिलेगा। फिर रात के बारह बजे तक तुम लोगों का कोई अतापता नहीं मिलता।" मामी ने रसोई में से ही चिल्लाकर कहा।
जल्दी-जल्दी खा-पीकर वे सब ऊपर के छज्जे पर आ गए। मामा जी ने दल पर फेंकने के लिए ढेर-सी फूलों की डालियाँ ख़रीद ली थी। उन्होंने राम लक्ष्मण पर डालियाँ फेंकी, रामदल का मज़ा लिया और नीचे आ गए। पार्क में पहुँचे तो नाटक शुरू ही होने वाला था। सबने अपनी-अपनी कुर्सियाँ घेर ली। थोड़ी देर में दर्शकों की भीड़ इतनी बढ़ गई कि पूरा पार्क भर गया। कुर्सियों के आसपास खड़े लोग कुर्सियों पर गिरे पड़ते थे, मानो तिल रखने को भी जगह नहीं थीं। इस सबसे घबराकर सोनू घर चलने की ज़िद करने लगा। थोड़ी देर तो वे लोग वहाँ बैठे पर जब उसने अधिक ज़िद की तो वे उठे और भीड़ में से किसी तरह रास्ता बनाते गिरते पड़ते सड़क पर आ गए।
खोमचे वाले हर जगह जमे हुए थे। चूरन, भेलपूड़ी, चाट, आइस्क्रीम और मूँगफली, सबने अपनी छोटी-छोटी ढेर-सी दुकाने खोल ली थीं। मिठाइयों और खिलौनों की भी भरमार थी। सड़क पर खूब हलचल थी और लाउड़स्पीकरों पर ज़ोर-ज़ोर से बजते हुए गाने कान फाड़े डालते थे।
आशू ने एक मूँगफली वाले से मुँगफली ख़रीद कर अपनी सारी जेबें भर लीं और सभी बच्चों ने अपने पसंद की चीज़ें ख़रीदीं। वे घर लौट कर आए तो मामा जी ने कहा, "अब तुम सब कार में बैठो, मैं तुम्हें घर छोड़ आऊँ?"
सिर्फ़ आइस्क्रीम और मूँगफल्ली में ही पंद्रह रुपए खर्च हो गए। फिर बीस रुपए में मेला कैसे देखा जाएगा। मामा जी ने हेमंत को उदास देखकर पूछा, "हेमंत बेटे, तुम्हें रोशनी और नाटक देखकर अच्छा नहीं लगा क्या? इतने उदास क्यों हो?''
सोनू और कंचू बोले, "मामा जी सिर्फ़ हेमंत ही नहीं, हम सभी बच्चे बहुत उदास हैं। एक तो छोटू को बुखार होने के कारण इस बार दशहरे पर हम अपनी फाइवस्टार सर्कस नहीं कर पा रहे हैं, दूसरे हम सबको मेले के लिए अबकी बार सिर्फ़ बीस रुपए मिलेंगे। इतने में मेला कैसे देखा जा सकता है?"
मामाजी मुस्करा कर बोले, "मेले में तुम्हें मिठाइयाँ ही ख़रीदनी होती हैं न? चलो भाई, अबकी बार मिठाई हम ख़रीद देंगे। बीस रुपए जमा करके तुम पुस्तकालय के सदस्य बन जाओ और नियमित रूप से पुस्तकें पढ़ो तो साल भर तुम्हारा ज्ञान भी बढ़ेगा और मनोरंजन भी होगा।"
सोनू ने पूछा, "तो मामा जी, पुस्तकालय में कॉमिक्स भी मिलती हैं क्या?"
"हाँ, हाँ, सब तरह की किताबें होती हैं वहाँ। कॉमिक्स से लेकर विज्ञान तक हर विषय की। कल सुबह तैयार रहना, तो तुम्हें पुस्तकालय दिखा लाऊँगा।
बच्चे घर लौटे तो मेले की मिठाइयाँ भूलकर पुस्तकालय की बातें करने लगे। सामने दुर्गा जी के मंदिर में अष्टमी की आरती के घंटे बजने शुरू हुए तो दादी जी ने याद दिलाया, "आरती लेने नहीं चलोगे क्या?" यह पुकार सुन सभी बच्चे दादी जी के साथ आरती लेने चल दिए।