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सोमवार, 19 दिसंबर 2011

Mother Teresa

एक मां ऐसी भी :  मदर टेरेसा 


अगस्त 1910 में अल्बानिया में जन्मी मदर टेरेसा ने कोलकाता (भारत) में 1950 में मिशनरीज की स्थापना की और ताउम्र गरीबों, अनाथों, बीमारों, निराश्रितों की सेवा के लिए अपना जीवन अर्पण कर दिया। आज उनका वास्तविक नाम कोई नहीं जानता, लेकिन उन्हें मदर यानी मां का जो सम्मान प्रदान किया गया, वह सचमुच उसकी हकदार थीं। इसके बारे में खुद उनका कहना था-मदर का खिताब मेरे लिए सबसे बडा सम्मान है। आइए इसी मां के बारे में जानते हैं कुछ रोचक बातें।

1.बचपन में ही पिता की मृत्यु के बाद उनकी मां ने उन्हें रोमन कैथलिक बनने को प्रेरित किया और 12 वर्ष की आयु तक आते-आते मानव सेवा के लिए अपना जीवन अर्पित कर देने की सोच उनके भीतर पनपने लगी। 18 वर्ष की आयु में उन्होंने घर छोड दिया और समाज सेवा में लगे सिस्टर्स ऑफ लॉरेटो में कार्य करना शुरू कर दिया। इसके बाद फिर कभी वह अपनी मां या बहनों से नहीं मिलीं।

2.वह कहा करती थीं-समूची मानव जाति की सबसे बडी बीमारी है अनचाहा, उपेक्षित या अप्रिय होना। एक बार उन्होंने प्रिंसेज डायना से कहा, यदि आप दूसरों का दर्द मिटाना चाहते हैं तो आपको खुद उस तकलीफ से गुजरना होगा।

3. मदर टेरेसा अपने कॉन्वेंट में सबसे छोटी नन थीं, यानी उनकी लंबाई मात्र पांच फीट थी।

4.मदर टेरेसा की पहचान हम जिस नीले बॉर्डर वाली सफेद साडी से करते हैं, वह महज 1.00 डॉलर की होती थी, सादी और सस्ती।

5.वह पहली भारतीय (उन्होंने भारतीय नागरिकता ली थी)थीं, जिन्हें नवंबर 16, 1996 में यूनाइटेड स्टेट्स की सम्मान्य नागरिकता मिली। गौरतलब है कि यह सम्मान प्राप्त करने वाली वह विश्व की चौथी व्यक्ति थीं।

6.मदर टेरेसा और चैरिटी मिशनरीज के सदस्य कोलकाता में रोज खाना एकत्र करके गरीबों को बांटा करते थे।

7. मानवीय कार्यो के लिए 1962 में उन्हें पद्मश्री प्राप्त हुआ, जो उन्हें मिलने वाला पहला भारतीय सम्मान था। जवाहर लाल नेहरू अवार्ड के साथ ही 1980 में उन्हें भारत रत्‍‌न की उपाधि भी प्रदान की गई।

8.एक बार वॉशिंगटन में उन्होंने कहा था कि जब वह खाद्य पदार्थो को व्यर्थ होता देखती हैं तो उन्हें बहुत क्रोध आता है। एक ओर इथोपिया है जहां लोग भूखे मर रहे हैं और एक तरफ वॉशिंगटन में चीजें फेंकी जा रही हैं। उन्होंने राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन को इथोपिया में पडने वाले अकाल से अवगत कराया। इसके बाद ही यू.एस. सरकार ने अकालग्रस्त क्षेत्रों में भोजन और दवाएं भिजवाई।

9.जब मदर हवाई यात्रा पर होती थीं तो वह लोगों द्वारा छोडा गया भोजन एकत्र करती थीं ताकि उसे गरीबों और भूखों तक पहुंचा सकें।

10.5 सितंबर 1997 को जब मदर टेरेसा की मृत्यु हुई, उनकी मिशनरीज में एक लाख से भी ज्यादा स्वयंसेवी थे, जो 123 देशों में 610 मिशनरीज चला रहे थे। एड्स रोगियों, कोढियों और टीबी के मरीजों के लिए घर और दवाओं के अलावा उनके बच्चों के लिए स्कूल और अन्य सुविधाएं प्रदान करने जैसे कार्य मिशनरीज के जरिए कराए गए।


Biography : Mother Teresa


Mother Teresa was born Agnes Gonxha Bojaxhiu in Skopje*, Macedonia, on August 26**, 1910. Her family was of Albanian descent. At the age of twelve, she felt strongly the call of God. She knew she had to be a missionary to spread the love of Christ. At the age of eighteen she left her parental home in Skopje and joined the Sisters of Loreto, an Irish community of nuns with missions in India. After a few months' training in Dublin she was sent to India, where on May 24, 1931, she took her initial vows as a nun. From 1931 to 1948 Mother Teresa taught at St. Mary's High School in Calcutta, but the suffering and poverty she glimpsed outside the convent walls made such a deep impression on her that in 1948 she received permission from her superiors to leave the convent school and devote herself to working among the poorest of the poor in the slums of Calcutta. Although she had no funds, she depended on Divine Providence, and started an open-air school for slum children. Soon she was joined by voluntary helpers, and financial support was also forthcoming. This made it possible for her to extend the scope of her work.

On October 7, 1950, Mother Teresa received permission from the Holy See to start her own order, "The Missionaries of Charity", whose primary task was to love and care for those persons nobody was prepared to look after. In 1965 the Society became an International Religious Family by a decree of Pope Paul VI.

Today the order comprises Active and Contemplative branches of Sisters and Brothers in many countries. In 1963 both the Contemplative branch of the Sisters and the Active branch of the Brothers was founded. In 1979 the Contemplative branch of the Brothers was added, and in 1984 the Priest branch was established.

The Society of Missionaries has spread all over the world, including the former Soviet Union and Eastern European countries. They provide effective help to the poorest of the poor in a number of countries in Asia, Africa, and Latin America, and they undertake relief work in the wake of natural catastrophes such as floods, epidemics, and famine, and for refugees. The order also has houses in North America, Europe and Australia, where they take care of the shut-ins, alcoholics, homeless, and AIDS sufferers.

The Missionaries of Charity throughout the world are aided and assisted by Co-Workers who became an official International Association on March 29, 1969. By the 1990s there were over one million Co-Workers in more than 40 countries. Along with the Co-Workers, the lay Missionaries of Charity try to follow Mother Teresa's spirit and charism in their families.

Mother Teresa's work has been recognised and acclaimed throughout the world and she has received a number of awards and distinctions, including the Pope John XXIII Peace Prize (1971) and the Nehru Prize for her promotion of international peace and understanding (1972). She also received the Balzan Prize (1979) and the Templeton and Magsaysay awards.

From Nobel Lectures, Peace 1971-1980, Editor-in-Charge Tore Frängsmyr, Editor Irwin Abrams, World Scientific Publishing Co., Singapore, 1997

This autobiography/biography was written at the time of the award and first published in the book series Les Prix Nobel. It was later edited and republished inNobel Lectures. To cite this document, always state the source as shown above.

* Former Uskup, a town in the Ottoman Empire.

** Mother Teresa's date of birth is disputed: "So unconcerned was she about accuracy in relation to the chronicling of her own life, and so disinclined actually to read anything written about her, that for many years and in a succession of books her birthdate was erroneously recorded as 27 August 1910. It even appeared in the Indian Loreto Entrance Book as her date of birth. In fact, as she confided to her friend, co-worker and American author, Eileen Egan, that was the date on which she was christened Agnes Gonxha Bojaxhiu. The date which marked the beginning of her Christian life was undoubtedly the more important to Mother Teresa, but she was none the less actually born in Skopje, Serbia, on the previous day." (Spink, Kathryn: Mother Teresa: A Complete Authorized Biography, HarperSanFrancisco, 1997.



Mother Teresa died on September 5, 1997.

शनिवार, 17 सितंबर 2011

INDIAN WOMEN


ऑंखों में पानी नहीं साहस का तूफान समाया है इन महिलाओं में


इरादे यदि हो बुलंद
तो बीच तूफान में समंदर भी रास्ता देता है।
पल-पल की कहानी लिखने को
समय खुद अपने हाथों से रोशनाई देता है। 

भारतीय नारी महान है, यह उक्ति अब धुँधली पड़ने लगी है। अब तो यह कहा जा सकता है कि भारतीय नारी महानतम होने लगी है। अब कोई भी ऐसा क्षेत्र नही। बचा, जिसमें उसका दखल न हो। फिर चाहे राजनीति हो या खेल, विज्ञान का क्षेत्र हो या फिर कोई अन्य क्षेत्र। भाारतीय नारियों की एक बड़ी श्रृंखला है, जिन्होंने कई ऐसे क्षेत्रों में कदम रखा है, जहाँ अब तक पुरुषों का ही वर्चस्व था। 
आज इक्कसवीं सदी में जीते हुए जब हम संपूर्ण विश्व की ओर देखते हैं, तो पाते हैं कि नारी शक्ति पूरी तरह से जाग्रत हो चुकी है। अपने इस्पाती इरादों के साथ वह लक्ष्य सिद्धि की ओर आगे बढ़ रही है। कड़ी मेहनत, योग्यता का सदुपयोग और परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लेने की स्वस्फूर्त प्रेरणा के द्वारा आज वह इतनी आगे निकल चुकी है कि उसकी शारीरिक और भावनात्मक निर्बलता भी उसके मार्ग की बाधा नहीं बन पाई। इसका ताजा उदाहरण देखने को मिला महामहिम प्रतिभा पाटिल में। 
राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद पर आसीन श्रीमती प्रतिभा पाटिल देश की सर्वप्रथम महिला राष्ट्रपति हैं। इन्होंने इस जवाबदारी को सँभालते हुए देश की अन्य प्रथम पंक्ति की महिलाओं की याद ताजा कर दी, जिन पर केवल नारी जाति को ही नहीं, बल्कि संपूर्ण देश को गर्व है। राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर विराजमान प्रतिभा पाटिल को इस उपलब्धि के लिए कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। उन्हें हाशिए पर लाने के लिए टीकाकारों ने कई दावपेंच खेले, किन्तु जीत बुलंद इरादों की हुई और वे अपने लक्ष्य तक पहुँच ही गई। जब उन्होंने अपने पद की शपथ ली, तो हर कहीं उनकी जीत की ही चर्चा हो रही थी। हर नारी की जबान पर उनका नाम था। चर्चा करते समय प्रत्येक नारी के मुख की गर्वीली मुस्कान यही कह रही थी, मानों वे स्वयं ही उस पद पर विराजमान हो। । 
ऐसा नहीं है कि हमारे देश में महिलाएँ कभी किसी उच्च पद पर रही ही नही। प्रधानमंत्री के पद पर आसीन स्वर्गीय श्रीमती इंदिरा गांधी भी प्रथम महिला प्रधानमंत्री थी, जो अपने दृढ़ निश्चय से ही शीर्ष तक पहुँची। आज नारी ने हर क्षेत्र में उन्नति की है। यही कारण है कि आज वह केवल रसोईघर की रानी न होकर प्रत्येक क्षेत्र में अपनी योग्यता का लोहा मनवा रही है। उसकी रसोईघर वाली छवि धीरे-धीरे धूमिल हो रही है, किन्तु इसकी शुरुआत वर्षों पहले हो चुकी है। 

सरोजिनी नायडू की बात करें, तो वे हमारे देश की एक प्रतिभावान महिला थी, जो स्वतंत्रता के बाद प्रथम महिला गर्वनर बनी। 'स्वर कोकिला' के नाम से जानी जाने वाली सरोजिनी नायडू राजनीति में होने के बाद भी सरल हृदय कवयित्री थी। राजनीति पैंतरेबाजी उनके स्वभाव का हिस्सा कभी न बन पाई। भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम जिस प्रकार राष्ट्रपति भवन के दरवाजे बच्चों के लिए खुले रखते थे, उसी प्रकार सरोजिनी नायडू ने भी राजभवन के द्वार सभी के लिए खुले रख दिए थे। प्रत्येक व्यक्ति के साथ अपनेपन से मिलना उनके स्वभाव में शामिल था। इसी कारण वह सामान्य लोगों में लोकप्रिय हो गई थी। पुरूष जहाँ अपने रूखे स्वभाव के कारण कई कामों में पीछे रह जाता है, वहीं नारी मेलजोल एवं अपनेपन के कारण कई कठिनाइयों को पार कर लेती है। यह बात सरोजिनी नायडू में थी। वे अपने सरल एवं मूदुल व्यवहार के कारण सभी को अपना बना लेती थी। । 
उत्तर प्रदेश की प्रथम मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी को कौन नहीं जानता? 1963 में जब इन्होंने अपना पदभार सँभाला तो किसे पता था कि उनकी इस सफलता के साथ ही उत्तरप्रदेश महिलाओं के मामले में एक भाग्यशाली राज्य बनने जा रहा है। राजनीति के क्षेत्र में या अन्य कई क्षेत्रों में इस बीच कई बदलाव आए और हमेशा यह प्रदेश अपनी महिला प्रतिभा का लोहा मनवाता रहा। सुचेता कृपलानी कभी भी 'नोट और वोट' के लिए काम नहीं किया। वे एक अच्छी प्रबंधक थीं। उनके साथ काम करने वालों की राय उनके बारे में यही थी कि वे अत्यंत बुध्दिशाली महिला थीं। केवल विधानसभा सदस्यों के साथ ही अपनेपन से नहीं मिलती थीं, बल्कि वे सामान्य लोगों से भी अपनापे के साथ बात करती थीं। छोटे से छोटे लोगों की परेशानियों की ओर ध्यान देती थीं। यही कारण है कि उन्होंने अपने यहाँ काम करने वाली एक स्त्री की बंध्यत्व की पीड़ा को समझा और उसका अच्छे से अच्छे डॉक्टर के पास इलाज करवाया। परिणाम स्वरूप उसे पुत्ररत्न की प्राप्ति हुई। अपनी व्यस्तताओं के बीच भी ऐसे सेवा कार्य के लिए समय निकाल लेना उनके स्वभाव में शामिल था। 

अपने देश की प्रथम मुख्य न्यायाधीश, दिल्ली की प्रथम महिला जज लीला शेठ किसी परिचय की मोहताज नहीं। इस महिला पर केवल गुजराती भाई-बहनों को ही नहीं, संपूर्ण देशवासियों को गर्व अनुभव होता है। दिल्ली हाईकोर्ट में जब उन्होंने न्यायमूर्ति की कुर्सी पर बैठ कर अपना पदभार संभाला, तो अनेक व्यक्ति केवल समाज में आए इस परिवर्तन को देखने के लिए ही उमड़ पड़े थे। 1971 में हिमाचल प्रदेश की हाईकोर्ट में उन्हें मुख्य न्यायाधीश के रूप में चुना गया। उसके पहले उन्होंने पूरे बारह वर्षों तक जज के पद पर आसीन होकर अपना कार्यभार ईमानदारी पूर्वक संभाला था। इसलिए उन्हें यह मुख्य पद दिया जाना अपने आपमें कोई आश्चर्य न था, किंतु खुशी इस बात की थीं कि वे देश की प्रथम मुख्य न्यायाधीश बनीं। इस सफलता को प्राप्त करने में उन्हें कई चुनौतियाें का सामना करना पड़ा। वे इस बात को अच्छी तरह जानती थीं कि कई टीकाकारों की नजरें उन पर गड़ी हुई हैं। इसलिए वे इस मामले में हमेशा सतर्क एवं अपने इरादों में दृढ़ रहीं। 
अब हम बात करते हैं इंग्लिश चैनल पर करने वाली प्रथम ऐशियन महिला आरती शाह की। जब उन्होंने इस उपलब्धि को प्राप्त किया, तब वे केवल 19 वर्ष और 5 दिन की थीं। कोलकाता की इस बंग्ला संस्कृति को करीब से जानने वाली गुजराती बाला ने अपने दृढ़ नि ्चय के बल पर केवल 16 धंटे और 20 मिनट में ही 42 मील तैर कर ईंग्लिश चैनल को पार कर लिया। 1960 में उन्हें इस साहसिक कार्य के लिए पद्मश्री से विभूशित किया गया। उनके द्वारा यह साहसिक कार्य करने के बाद इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए महिलाओं के लिए राह खुल गई। कितने ही राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने के बाद आरती शाह ने ओलम्पिक में भी देश का नाम शीर्ष पर पहुँचाया। सन् 1952 में उनके साथ ओलम्पिक खेलों में हिस्सा लेने के लिए मुंबई की डॉली नजीर भी गई थीं। दोनों ने ही सेंडगेट में भारत की विजय पताका फहराई थी। ये भारत के खेल के इतिहास के सुनहरे क्षण थे, जिन्हें भुलाया नहीं जा सकता। 
कार रैली की बात करें, तो आमतौर पर यह पुरुषों का ही क्षेत्र माना जाता है। किंतु इस क्षेत्र में भी महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। सन् 2002 में हिमालय कार रैली मेें मारूति-800 कार में 18 पुरूषों के साथ स्पर्धा में आने वाली सारिका शेरावत ने आठवाँ स्थान प्राप्त किया। भारतीय कार रैली के भीष्म पितामह माने जाने वाले हरि सिंह से आशीर्वाद प्राप्त कर वे कभी पीछे नहीं रहीं। दोगुने जोश के साथ आगे बढ़ने वाली इस महिला ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और कार रैली में हमेशा साहसिकता के साथ भाग लिया। 2006 में स्पर्धा के दौरान उनकी जिप्सी पलट गई थी, तब वे गंभीर रूप से घायल हो गई थी, किंतु उनका मनोबल नहीं टूटा। ऐसी कई छोटी-मोटी दुर्घटनाओं को हँसते हुए झेलते ये महिला लगातार अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ती गई। 
क्या आपने आग से जुड़ी हुई किसी दुर्घटना के समय अग्निशमन अधिकारी के रूप में किसी महिला को देखा है? आपको आश्चर्य होगा कि हर्शिनी कानेकर हमारे देश की प्रथम महिला अग्निशमन अधिकारी हैं। जब इंटरव्यू के दौरान बोर्ड के सदस्यों कहा कि वे अग्निशमन दल की ''किरण बेदी'' बनने जा रही हैं, तो उनके चेहरे पर साहस और उत्साह की मुस्कान खिल उठीं और दृढ़ संकल्प के साथ यह महिला अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने को तत्पर हो उठी।
साहस की साकार मूर्ति बचेन्द्री पाल को कौन नहीं जानता! माउन्ट ऐवरेस्ट पर भारत की विजय पताका फहराने वाली यह प्रथम भारतीय महिला बनीं। एक ऐसी पर्वतारोही जिन्होंने 13 वर्ष की छोटी उम्र में ही कुछ अलग कर दिखाने का निश्चय कर लिया। उनकी प्रेरणा बनीं- ईंदिरा गांधी की वे तस्वीरें, जो वे बचपन में अखबारों में देखी थीं। इन तस्वीरों ने उन्हें जीवन में कुछ नया कर दिखाने का जोश भर दिया। एक ग्रामीण बाला के लिए जहाँ साक्शर होना भी अपने आपमें एक उपलब्धि होता है, वो यदि स्नातकोत्तर करने के बाद माउन्टेनियरींग का कोर्स भी कर ले, तो यह एक आश्चर्य होता है। इसी आश्चर्य के साथ वे उस सपने को पूरा करने में लग गईं जो उन्होेंने बचपन में देखा था। 23 मई 1984 में उन्होंने माउन्ट एवरेस्ट पर जब भारत की विजय पताका फहराई तो भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पन्नों पर एक और नाम जुड़ गया। 
भारतीय सफल महिलाओं की सूची इतनी लम्बी है कि उन्हें गिनाते हुए समय गुजर जाएगा, पर नामों की इतिश्री नहीं होगी। होनी भी नहीं चाहिए। आज महिलाएँ जिस साहस और उत्साह के साथ अपने लक्ष्य में आगे बढ़ रही है, उसमें कोई बाधा उन्हें डिगा नहीं सकती। किरण बेदी, कल्पना चावला, सुनीता विलियम्स, अरूंधती रॉय, हरिता देओल, सानिया मिर्जा, झूलन गोस्वामी, मेधा पाटकरे के अलावा कार्पोरेट जगत में नित नए नाम आ रहे हैं, जो अपनी सूझबूझ से लगातार आगे बढ़ रही हैं। इन महिलाओं ने हर क्षेत्र में साहस का परिचय दिया है। इससे यह कहा जा सकता है कि अब किसी भी महिला को चारदीवारी के भीतर बाँधना मुश्किल है, क्योंकि उसने अब अपना आसमान बना लिया है। अब उसे आवश्यकता नहीं है पुरुषों के सहारे की, अपने हाथों से अपना भविष्य लिखने वाली भारतीय महिलाएँ एक दिन पूरे विश्व में छा जाएँगी देखते रहना। 

सोमवार, 29 अगस्त 2011

Gurudev Ravindranath Tagore


साहित्यकार, कवि, शिक्षाविद्, युगदृष्टा
-
गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर
रविंद्रनाथ टगोर 


रविन्द्र नाथ टैगोर (रवीन्द्रनाथ ठाकुर, रोबिन्द्रोनाथ ठाकुर) (7 मई, 1861-7 अगस्त,1941) को गुरुदेव के नाम से भी जाना जाता है। वे विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के एकमात्र नोबल पुरस्कार (1913) विजेता हैं। बांग्ला साहित्य के माध्यम से भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नयी जान फूँकने वाले युगदृष्टा थे। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति है। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं। भारत का राष्ट्र.गान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बांग्ला गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं।

जन्मस्थान : 
जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी 

रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म देवेंद्रनाथ टैगोर और शारदा देवी के संतान के रूप में कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ। उनकी स्कूल की पढ़ाई प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। टैगोर ने बैरिस्टर बनने की चाहत में 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में पब्लिक स्कूल में नाम दर्ज कराया। उन्होंने लंदन कालेज विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया लेकिन 1880 में बिना डिग्री हासिल किए ही वापस आ गए। उनका 1883 में मृणालिनी देवी के साथ विवाह हुआ।
बचपन से ही उनकी कविताए छन्द और भाषा में अद्भुत प्रतिभा का आभास लोगों को मिलने लगा था। उन्होंने पहली कविता आठ साल की उम्र में लिखी थी और 1877 में केवल सोलह साल की उम्र में उनकी लघुकथा प्रकाशित हुई थी। भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई जान फूंकने वाले युगदृष्टा टैगोर के सृजन संसार में गीतांजलि, पूरबी प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, परिशेष, पुनश्च, वीथिका शेषलेखा, चोखेरबाली, कणिका, नैवेद्य मायेर खेला और क्षणिका आदि शामिल हैं। देश और विदेश के सारे साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि उन्होंने आहरण करके अपने अन्दर सिमट लिए थे। उनके पिता ब्राह्म धर्म के होने के कारण वे भी ब्राह्म थे। पर अपनी रचनाओं व कर्म के द्वारा उन्होने सनातन धर्म को भी आगे बढ़ाया।

रचनाएँ 


मनुष्य और ईश्वर के बीच जो चिरस्थायी सम्पर्क है, उनकी रचनाओ के अन्दर वह अलग अलग रूपों में उभर आता है। साहित्य की शायद ही ऐसी कोई शाखा है, जिनमें उनकी रचना न हो कविता, गान, कथा, उपन्यास, नाटक, प्रबन्ध, शिल्पकला - सभी विधाओं में उन्होंने रचना की। उनकी प्रकाशित कृतियों में - गीतांजली, गीताली, गीतिमाल्य, कथा ओ कहानी, शिशु, शिशु भोलानाथ, कणिका, क्षणिका, खेया आदि प्रमुख हैं। उन्होने कुछ पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। अँग्रेज़ी अनुवाद के बाद उनकी प्रतिभा पूरे विश्व में फैली।

शांतिनिकेतन की स्थापना
टैगोर को बचपन से ही प्रकृति का सान्निध्य बहुत भाता था। वह हमेशा सोचा करते थे कि प्रकृति के सानिध्य में ही विद्यार्थियों को अध्ययन करना चाहिए। इसी सोच को मूर्तरूप देने के लिए वह 1901 में सियालदह छोड़कर आश्रम की स्थापना करने के लिए शांतिनिकेतन आ गए। प्रकृति के सान्निध्य में पेड़ों, बगीचों और एक लाइब्रेरी के साथ टैगोर ने शांतिनिकेतन की स्थापना की।
टैगोर ने करीब 2,230 गीतों की रचना की। रवींद्र संगीत बांग्ला संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। टैगोर के संगीत को उनके साहित्य से अलग नहीं किया जा सकता। उनकी अधिकतर रचनाएं तो अब उनके गीतों में शामिल हो चुकी हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ठुमरी शैली से प्रभावित ये गीत मानवीय भावनाओं के अलग.अलग रंग प्रस्तुत करते हैं। अलग.अलग रागों में गुरुदेव के गीत यह आभास कराते हैं मानो उनकी रचना उस राग विशेष के लिए ही की गई थी।

टैगोर और महात्मा गांधी

गुरुदेव ने जीवन के अंतिम दिनों में चित्र बनाना शुरू किया। इसमें युग का संशय, मोह, क्लांति और निराशा के स्वर प्रकट हुए हैं। मनुष्य और ईश्वर के बीच जो चिरस्थायी संपर्क है उनकी रचनाओं में वह अलग-अलग रूपों में उभरकर सामने आया। टैगोर और महात्मा गांधी के बीच राष्ट्रीयता और मानवता को लेकर हमेशा वैचारिक मतभेद रहा। जहां गांधी पहले पायदान पर राष्ट्रवाद को रखते थे, वहीं टैगोर मानवता को राष्ट्रवाद से अधिक महत्व देते थे। लेकिन दोनों एक दूसरे का बहुत अधिक सम्मान करते थे, टैगोर ने गांधीजी को महात्मा का विशेषण दिया था।

गांधीजी ने टैगोर को अनुदान दिया

एक समय था जब शांतिनिकेतन आर्थिक कमी से जूझ रहा था और गुरुदेव देश भर में नाटकों का मंचन करके धन संग्रह कर रहे थे। उस वक्त गांधी ने टैगोर को 60 हजार रुपये के अनुदान का चेक दिया था।
जीवन के अंतिम समय 7 अगस्त 1941 के कुछ समय पहले इलाज के लिए जब उन्हें शांतिनिकेतन से कोलकाता ले जाया जा रहा था तो उनकी नातिन ने कहा कि आपको मालूम है हमारे यहां नया पावर हाउस बन रहा है। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि हां पुराना आलोक चला जाएगा नए का आगमन होगा।

शांतिनिकेतन