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सोमवार, 6 जुलाई 2015

दीदी तीन... जीजा पांच

मजेदार कहानी

आज आपको एक कथा सुनाने का मन हो रहा है। एक गांव में बलभद्दर (बलभद्र) रहते थे। क्या कहा...किस गांव में? आप लोगों की बस यही खराब आदत है...बात पूछेंगे, बात की जड़ पूछेंगे और बात की फुनगी पूछेंगे। तो चलिए, आपको सिलसिलेवार कथा सुनाता हूं। ऐसा हो सके, इसलिए एक पात्र मैं भी बन जाता हूं। ...तो मेरे गांव में एक बलभद्दर रहते थे। अब आप यह मत पूछिएगा कि मेरा गांव कहां है? मेरा गांव कोलकाता में हो सकता है, लखनऊ में हो सकता है, आगरा में हो सकता है, पंजाब के किसी दूर-दराज इलाके में भी हो सकता है। कहने का मतलब यह है कि मेरा गांव हिंदुस्तान के किसी कोने में हो सकता है, अब यह आप पर निभज़्र है कि आप इसे कहां का समझते हैं।

तो बात यह हो रही थी कि मेरे गांव में एक बलभद्दर रहते थे। उसी गांव में रहते थे छेदी नाऊ। तब मैं उन्हें इसी नाम से जानता था। उस समय मैं यह भी नहीं जानता था कि 'छेदी बड़का दादा' (पिता के बड़े भाई) यदि शहर में होते तो छेदी सविता कहे जाते। उन दिनों जातीयता का विष इस कदर समाज में नहीं व्याप्त था। तब ब्राह्मण, ठाकुर, पासी, कुम्हार, चमार आदि जातियों में जन्म लेने के बावजूद लोग एक सामाजिक रिश्ते में बंधे रहते थे। तो कहने का मतलब यह था कि छेदी जाति के नाऊ होने के बावजूद गांव किसी के भाई थे, तो किसी के चाचा। किसी के मामा, तो किसी के भतीजा। हर व्यक्ति उनसे अपने रिश्ते के अनुसार व्यवहार करता था। छेदी बड़का दादा को तब यह अधिकार था कि वे किसी भी बच्चे को शरारत करते देखकर उसके कान उमेठ सकें। कई बार वे मुझे भी यह कहते हुए दो कंटाप जड़ चुके थे, 'आने दो पंडित काका को, तुम्हारी शिकायत करता हूं।' पंडित काका बोले, तो मेरे बाबा जी। हां, तो बात चल रही थी बलभद्दर की और बीच में कूद पड़े छेदी। बात दरअसल यह थी कि एक दिन भांग के नशे में यह कथा छेदी बड़का दादा ने मुझे सुनाई थी। और अब कागभुसुंडि की तरह यह कथा मैं आपको सुना रहा हूं।

हां, तो बात यह थी कि मेरे गांव में एक बलभद्दर रहते थे। उनका एक बेटा था श्याम सुंदर। बाइस साल की उम्र हुई, तो उसे लड़की वाले देखने आये और एक जगह बात तय हो गयी। बात तय होने की देर थी कि बर-बरीच्छा, तिलक आदि कायज़्क्रम भी जल्दी-जल्दी निपटा दिए गए। उन दिनों आज की तरह लड़के का कमाऊपन तो देखा नहीं जाता था। बस, लड़के की सामाजिक हैसियत, जमीन-जायदाद और घर का इतिहास देखा जाता था। आज की तरह लड़कियों को दिखाने का भी चलन नहीं था। तो साहब, मेरे गांव में जो बलभद्दर रहते थे, उनके बेटे के विवाह का दिन आ पहुंचा। आप लोगों को शायद यह पता ही हो कि आज से तीन-तीन साढ़े तीन दशक पहले तक शादी-ब्याह, तिलक, मुंडन, जनेऊ आदि जैसे समारोहों में नाऊ की क्या अहमियत होती थी। शादी के दिन सुबह से ही छेदी की खोज होने लगी थी। दूल्हे की मां कई बार चिरौरी कर चुकी थी, 'भइया छेदी, देखना समधियाने में कोई बात बिगड़ न जाये। मेरा लड़का तो बुद्धू है। तुम जानकार आदमी हो, सज्ञान हो। तुम्ही लाज रखना।'छेदी ने गुड़ का बड़ा सा टुकड़ा मुंह में डालते हुए कहा, 'काकी, तुम चिंता मत करो। मैं हूं न।'

छेदी बड़का दादा की बुद्धि का लोहा सचमुच लोग मानते थे। अगर पिछले एकाध दशक की बात छोड़ दी जाए, तो पंडित और नाऊ को बड़ा हाजिर जवाब और चतुर माना जाता था। छेदी वाकई थे चतुर सुजान। उनकी बुद्धि की एक मिसाल आपके सामने रखता हूं। उन दिनों मैं लखनऊ में पांचवीं में पढ़ता था। गमीज़् की छुट्टियों में गांव जाता था। एक दिन मेरे छोटे भाई के बाल छेदी बड़का दादा काट रहे थे और उनके आगे मैं अपना ज्ञान बघार रहा था, 'बड़का दादा...आपको मालूम है, सूयज़् के चारों ओर पृथ्वी चक्कर लगाती है और पृथ्वी का चक्कर चंद्रमा लगाता है।'

मेरे इतना कहते ही छेदी बड़का दादा खिलखिलाकर हंस पड़े, 'तुम्हारा पढऩा-लिखना सब बेकार है। यह बताओ गधेराम...अगर पृथ्वी सूरज महाराज का चक्कर लगाती है, तो हम सब लोगों को मालूम क्यों नहीं होता। अगर ऐसा होता, तो अब तक चलते-चलते हम लोग किसी गड्ढे में गिर गए होते। हमारे घर-दुवार किसी ताल-तलैया में समा गए होते।'
उनकी इस बात का जवाब तब मेरे पास नहीं था। मैं लाख तकज़् देता रहा, लेकिन वहां बैठे लोग छेदी नाऊ का ही समथज़्न करते रहे। तब सचमुच सापेक्षता का सिद्धांत नहीं जानता था या यों कहो कि ट्रेन में बैठने पर खिड़की से देखने पर पेड़ों के भागने का उदाहरण नहीं सूझा था। खैर...।

बात कुछ इस तरह हो रही थी कि मेरे गांव में जो बलभद्दर रहते थे, उनके बेटे श्याम सुंदर की बारात दो घंटे लेट से ही सही दुल्हन के दरवाजे पहुंच गयी। थोड़े बहुत हो-हल्ला के बाद द्वारपूजा, फेरों आदि का कायज़्क्रम भी निपट गया। इस झमेले में दूल्हा और छेदी काफी थक गए थे। लेकिन मजाल है कि छेदी ने दूल्हे का साथ एक पल को भी छोड़ा हो। वैसे भी उन दिनों दूल्हे के साये की तरह लगा रहना नाऊ का परम कतज़्व्य माना जाता था। इसका कारण यह है कि तब के दूल्हे 'चुगद' हुआ करते थे। ससुराल पहुंचते ही वे साले-सालियों से 'चांय-चांय' नहीं किया करते थे। साले-सालियों से खुलते-खुलते दो-तीन साल लग जाते थे। हां, तो आंखें मिचमिचाते छेदी दूल्हे के हमसाया बने उसके आगे-पीछे फिर रहे थे। सुबह के चार बजे हल्ला हुआ, 'दूल्हे को कोहबर के लिए भेजो।' यह गुहार सुनते ही छेदी चौंक उठे। थोड़ी देर पहले ही दूल्हे के साथ उन्होंने झपकी ली थी। लेकिन बलभद्दर ने जैसे ही दूल्हे से कहा, 'भइया, चलो उठो। कोहबर के लिए तुम्हारा बुलावा आया है।'

छेदी ने जमुहाई लेते हुए दूल्हे के सिर पर रखा जाने वाला 'मौर' उठा लिया और बोले, 'श्याम भइया, चलो।'

जनवासे से पालकी में सवार दूल्हे के साथ-साथ पैदल चलते छेदी नाऊ उन्हें समझाते जा रहे थे, 'भइया, शरमाना नहीं। सालियां हंसी-ठिठोली करेंगी, तो उन्हें कराज़् जवाब देना। अपने गांव-जंवार की नाक नहीं कटनी चाहिए। लोग यह न समझें कि दूल्हा बुद्धू है।'

पालकी में घबराये से दूल्हे राजा बार-बार यही पूछ रहे थे, 'कोहबर में क्या होता है, छेदी भाई। तुम तो अब तक न जाने कितने दूल्हों को कोहबर में पहुंचा चुके हो। तुम्हें तो कोहबर का राई-रत्ती मालूम होगा।'

'कुछ खास नहीं होता, भइया। हिम्मत रखो और करेज़् से जवाब दो। तो सालियां किनारे नहीं आयेंगी।' छेदी दूल्हे को सांत्वना दे रहे थे। तब तक पालकी दरवाजे तक पहुंच चुकी थी। पालकी से उतरकर दूल्हा सीधा कोहबर में चला गया और छेदी कोहबर वाले कमरे के दरवाजे पर आ डटे। घंटा भर लगा कोहबर के कायज़्क्रम से निपटने में। इसके बाद दूल्हे को एक बड़े से कमरे में बिठा दिया गया। रिश्ते-नाते सहित गांव भर की महिलाएं और लड़कियां दूल्हे के इदज़्-गिदज़् आकर बैठ गयीं। लड़कियां हंस-हंसकर दूल्हे से चुहुल कर रही थीं। उनके नैन बाणों से श्याम सुंदर लहूलुहान हो रहे थे। कुछ प्रौढ़ महिलाएं लड़कियों की शरारत पर मंद-मंद मुस्कुरा रही थीं। तभी एक प्रौढ़ महिला ने दूल्हे से पूछा, 'भइया, तुम्हारे खेती कितनी है?'

सवाल सुनकर भी दूल्हा तो सालियों के नैन में उलझा रहा लेकिन छेदी नाऊ सतकज़् हो गए। उन्हें याद आया कि चलते समय काका ने कहा था, बेटा बढ़ा-चढ़ाकर बताना। सो, उन्होंने झट से कहा, ' बयालिस बीघे....' दूल्हा यह सुनकर प्रसन्न हो गया। मन ही मन बोला, 'जियो प_े! तूने गांव की इज्जत रख ली।'

इसके बाद दूसरी महिला ने बात आगे बढ़ाई, 'दूल्हे के चाचा-ताऊ कितने हैं?'रेडीमेड जवाब तैयार था छेदी नाऊ के पास, 'वैसे चाचा तो दो हैं, लेकिन चाचियां चार।'

यह जवाब भी सुनकर दूल्हा मगन रहा। वह अपनी सबसे छोटी साली को नजर भरकर देखने के बाद फिर मन ही मन बोला, 'जियो छेदी भाई...क्या तीर मारा है।'

पहली वाली महिला ने ब्रह्मास्त्र चलाया, 'और बुआ?'

छेदी ने एक बार फिर तुक्का भिड़ाया, 'बुआ तो दो हैं, लेकिन फूफा साढ़े चार।' यह सवाल सुनते ही दूल्हा कुनमुना उठा। दूल्हे ने अपना ध्यान चल रहे वातालज़प पर केंद्रित किया और निगाहों ही निगाहों में उसे उलाहना दी, 'अबे क्या बक रहा है?' लेकिन बात पिता के बहिन की थी, सो उसने सिफज़् उलाहने से ही काम चला लिया। तभी छेदी बड़का दादा भी सवाल दाग बैठे, 'और भउजी के कितनी बहिनी हैं?'

वहां मौजूद महिलाएं चौंक गयीं। एक सुमुखी और गौरांगी चंचला ने मचलते हुए पूछ लिया, 'कौन भउजी?'

छेदी के श्यामवणज़् मुख पर श्वेत दंतावलि चमक उठी, 'अपने श्याम सुंदर भइया की मेहरारू...हमार भउजी...।' इस बार दूल्हे ने प्रशंसात्मक नजरों से छेदी को देखा। दोनों में नजर मिलते ही छेदी की छाती गवज़् से फूल गयी, मानो कह रहे हों, 'देखा...किस तरह इन लोगों को लपेटे में लिया।'

सुमुखी गौरांगी चंचला ने इठलाते हुए कहा, 'चार...जिसमें से एक की ही शादी हुई है...तुम्हारे भइया के साथ।'

तभी एक दूसरी श्यामवणीज़् बाला ने नाखून कुतरते हुए पूछ लिया,'जीजा जी के कितनी बहिनी हैं।'

छेदी के मुंह से एकाएक निकला, 'दीदी तो तीन, लेकिन जीजा पांच।' इधर छेदी के मुंह से यह वाक्य पूरा भी नहीं हो पाया था कि दूल्हा यानी श्याम सुंदर अपनी जगह से उछला और छेदी पर पिल पड़ा, 'तेरी तो...' इसके बाद क्या हुआ होगा। इसकी आप ही कल्पना कर सकते हैं। मुझे इसके बारे में कुछ नहीं कहना है, कोई टिप्पणी नहीं करनी है। हां, मुझे छेदी बड़का दादा का यह समीकरण न तो उस समय समझ में आया था और न अब समझ में आया है। अगर आप में से कोई इस समीकरण को सुलझा सके तो कृपा करके मुझे भी बताए कि जब श्याम सुंदर के दीदी तीन थीं, तो जीजा पांच कैसे हो सकते हैं।


इस व्यंग्य के लेखक अशोक मिश्र  अखबार हम वतन के स्थानीय संपादक हैं. ये अमर उजाला, दैनिक जागरण समेत की अखबारों में काम कर चुके हैं. इनका एक व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है और इन दिनों एक उपन्यास के लेखन में व्यस्त हैं.

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

कहानी :शर्त और अनुभव


उम्र के साथ अनुभव आता है , एक बुजुर्ग व्यक्ति और नवयुवक के बीच जो सोच तथा निर्णय का जो फर्क होता है वो अनुभव के कारण ही होता है ।

शायद आपने ये कहानी सुनी होगी . एक बार की बात है, एक शादी में लड़की वालों ने शर्त रखी की बारात में कोई बुजुर्ग नहीं आयेगे , केवल जवान ही शादी में शामिल होंगे . यह बात जब गाँव के एक बुजुर्ग राम जियावन बाबा को पता चली तो वो बोले "देखो बारात में केवल जवान लोग बुलाये गए हैं तो हो न हो कोई गड़बड़ जरुर है ". लड़के के मित्र बोले "बाबा आपको जाने को नहीं मिल रहा है इसलिए आप ऐसा बोल रहे हो ". राम जियावन बोले "नाहीं बच्चा , कुछ बात है, तभी लड़की वाले ऐसी शर्त रखे हैं ".

लड़के के पिता जी बोले "देखिये रिश्तेदारी में शादी हो रही है तो क्या गड़बड़ होगी. लड़की का भाई तो हमें भी आने से मना कर गया है ". राम जियावन बोले "देखो भैया , हम तो शादी में जायेंगे ". लड़के के पिता जी बोले "ठीक है राम जियावन आप लड़को से पूछ लीजिये की वो आप को ले के जायेंगे की नहीं ". लड़को ने मना कर दिया की हम बाबा को लेके नहीं जायेगे .

बाबा ने लड़के के छोटे भाई को बुलाया और कहा "देखो , हम शादी में जायेंगे और ये बात किसी को पता नहीं चलनी चाहिए". लड़के भाई भाई बोला "पर आप जायंगे कैसे ". बाबा बोले "वो जो कपडे और सामान वाला बक्सा जा रहा है , वैसे ही एक बक्से में हम बैठ के चले जायेंगे और वो बक्सा तुम गाड़ी से निचे मत उतरवाना ".

शादी का दिन आ गया ,केवल जवान लड़के ही बारात में शामिल हुए और बाबा बक्से में बैठ कर चल दिए . बारात लड़की के दरवाजे पर पहुंची तो बड़ी आव-भगत हुई लोग बड़े खुश वाह मज़ा आ गया कोई बड़ा नहीं है जम के खायो-पियो . नाश्ते के बाद जब रात में खाने का समय आया तो लड़की का भाई आया और बोला "भोजन तैयार हो गया है पर एक सब्जी बनना बाकी रह गयी है अगर उसे आप लोग बना ले तो आप भोजन कर सकते है अन्यथा आपको भोजन नहीं मिलेगा ".

दुल्हे के दोस्त बोले "अरे इतने लोग है सब्जी तो आराम से बन जायेगी बस आप सब सामान दे दीजिये". लड़की का भाई एक बड़ा सा मटका, जलाने के लिए लकडी और सामान ले आया और बोला "इस मटके में कोहडा (कद्दू ) है आप लोग इसकी सब्जी बना लीजिये शर्त ये है की ये मटका टूटना नहीं चाहिए ". अब सारे लड़के सोच में पड़ गए की बिना मटके को तोडे कोहडा (कद्दू ) बहार कैसे आएगा और उसकी सब्जी कैसे बनेगी .तभी किसी ने लड़की के भाई से पूछा "महाराज , ये कद्दू इस मटके में गया कैसे ?". लड़की का भाई बोला जब कद्दू बहुत छोटा था तभी उसे मटके में डाल दिया था , धीरे-धरे कद्दू बढता गया और अब वो मटके जितना बड़ा हो गया है ".

सारे युवक परेशान की अब सब्जी कैसे बनेगी ,और सोचने लगे "यही बात थी तभी बुजुर्गो को आने से मना किया था ".जब सब सोच के थक गए तो दुल्हे के छोटे भाई को याद आया की बक्से में तो राम जियावन बाबा है , उन्ही से पूछ के आते है . वह बाबा के पास जाता है और बाबा को पूरी कहानी बताता है , बाबा पूरी कहानी सुन कर बोलते है "बस इतनी सी बात ". लड़का बोलता है "हम बहुत देर से परेशान है और आप कह रहे हैं इतनी सी बात , बताइए सब्जी कैसे बनेगी ". बाबा बोले "कद्दू को मटके में ही रहने दो, मटके को आग पर रख पर पकाना शुरू करो, थोडा पानी डाल देना मटके में जब पानी मर्म हो जाये तो कद्दू को लकडी से मार के फोड़ देना और फिर नमक -मसाला डाल के पका देना , सब्जी बन जायेगी ". लड़के ने बाबा की बताई हुई बात पर अमल किया ,थोडी मेहनत के बाद सब्जी तैयार हो गयी तो लड़की वालो को खबर कर दी गयी .

लड़की के पिता जी आये और जब उन्होंने देखा की लड़को ने सब्जी बना दी है तो उन्होंने कहा "हो न हो , आप लोगों के साथ कोई बुजुर्ग जरुर आया है वरना आप को कैसे पता चला की कद्दू की सब्जी बिना कद्दू को काटे हुए भी बन सकती है ". लड़के पहले मना करते रहे की उनके साथ कोई बुजुर्ग नहीं आया है पर जब वो लोग नहीं माने तब दुल्हे के भाई ने बताया की राम जियावन बाबा आये हैं और वो बक्से में बैठे हुए हैं . लड़की के पिता जी बोले "ऐसा अनुभव केवल बुजुर्ग व्यक्ति के पास ही हो सकता है ".

बुधवार, 2 मई 2012

विक्रम और बेताल



नास्तिक की देव प्रार्थना

धुन का पक्का विक्रम पुनः पेड़ के पास गया। पेड़ पर से शव को उतारा और उसे कंधे पर ड़ाल लिया। फिर यथावत् श्मशान की ओर बढ़ता हुआ जाने लगा। तब शव के अंदर के वेताल ने कहा, ‘‘राजन्, इस भयंकर श्मशान में आधी रात को इतने कष्ट झेलते हुए तुम्हें देखकर आश्चर्य होता है। देखा गया है कि कुछ आस्तिक धन का उपयोग दान धर्मों के लिए करते हैं। ऐसे दानी, क्रमशः दरिद्र हो जाते हैं। ऐसे ही वे नास्तिक भी हैं, जो दान धर्म के बारे में किंचित भी नहीं सोचते। वे धन इकठ्ठा करते जाते हैं और देखते-देखते करोड़पति बन जाते हैं। वे सब प्रकार के सुखों का अनुभव करने लगते हैं। मैं तुम्हें ऐसे दो आस्तिक व नास्तिक बाप-बेटे की कहानी सुनाऊँगा। थकावट दूर करते हुए उनकी कहानी ध्यान से सुनना।'' फिर वेताल उनकी कहानी यों सुनाने लगाः

 भाग्यपुर के निवासी धनपाल को विरासत में भारी संपत्ति मिली। साथ ही उसमें दया, देवभक्ति भी भारी मात्रा में थे। कोई भी ज़रूरतमंद खाली हाथ लौटता नहीं था। उसकी पत्नी सुरुचि को यद्यपि भगवान में विश्वास था पर पति का इस प्रकार से देव भक्ति के नाम पर धन लुटाना कतई पसंद न था। वह हमेशा उससे कहा करती थी कि पुरखों की दी हुई संपत्ति को संतान को सौंपना कर्तव्य है। परंतु धनपाल उसकी बातों पर कोई ध्यान देता नहीं था।

श्रीपाल, गोपाल, गुणपाल उसके तीन पुत्र थे। दूसरा और तीसरा बेटा पिता की ही बातों को मानते थे। बडा बेटा श्रीपाल माँ की बातें ही सही मानता था। वह समझता था कि आस्तिक होने से दान-धर्म में बहुत धन लुटाना पड़ता है। इसीलिए संपत्ति की रक्षा के वास्ते वह बचपन से ही नास्तिक हो गया । और था अव्वल दर्जे का कंजूस भी।

धनपाल ने एक दिन पत्नी से कहा, ‘‘धन शाश्वत नहीं है, वह संतोष नहीं देता। मनुष्य को संतोष देती है तो संतृप्ति मात्र ही। जिनमें देव भक्ति व दया गुण नहीं होते, उनमें कदापि संतृप्ति नहीं होती।''

पत्नी सुरुचि ने पति की बातों का खंडन करते हुए कहा, ‘‘जब धन होता है, तब उसके मूल्य को जानने से हम इनकार करते हैं। जब धन नहीं होता तब हमारी अच्छाई हमारे काम नहीं आती, मांड का पानी भी पीने को नहीं देती।''

बेटों के बालिग होने तक धनपाल के पास जो भी धन था, खर्च हो गया। बीस एकड़ों की भूमि मात्र बच गयी। उसके खर्च के लिए खेत से आनेवाली आमदनी काफी नहीं पड़ती थी, इसलिए उसने खेत का एक भाग बेचना चाहा। तब सुरुचि ने पति से कहा, ‘‘बच्चे जवान हो गये हैं। संपत्ति में से उनका हिस्सा उन्हें दे दीजिये और अपना जो हिस्सा है, आप जैसा चाहें, कर लीजिये।'' कटुता-भरे स्वर में उसने कहा।

धनपाल ने पत्नी ने कहे अनुसार ही किया। उसने संपत्ति को चार हिस्सों में बाँट दिया और बेटों से कहा, ‘‘हममें से हर कोई पाँच एकड़ का स्वामी है। धन के खर्च के विषय में जो मेरी पद्धति को मानते हैं, वे मेरे साथ रह सकते हैं, जो मेरी पद्धति को स्वीकार नहीं करते, वे अलग रह सकते हैं।''

दूसरे और तीसरे बेटे ने पिता के ही साथ रहने का निश्चय किया। परंतु बड़ा बेटा श्रीपाल अलग हो गया। उसे खेती पर भरोसा नहीं था इसलिए गाँव में ही उसने एक छोटा व्यापार शुरू किया। दो सालों के अंदर ही वह लखपति बन गया। कुछ दोस्तों ने उससे धन की सहायता माँगी। पर उसने किसी की भी सहायता नहीं की, इसलिए वे उसे कंजूस कहने लगे।

थोड़े ही समय के अंदर धनपाल ने जो भी ज़मीन थी, बेच डाली। खाने के लिए भी जब कुछ नहीं रह गया तब उसने दूसरों से मदद माँगी। परंतु किसी ने भी मदद नहीं की। तब धनपाल की समझ में आया कि अपनी शक्ति से बढ़कर दान देना अच्छा नहीं। जब कोई दूसरा चारा नहीं रह गया तो वह सपरिवार बडे बेटे के पास गया और बोला, ‘‘तुममें जो दूरदर्शिता थी, वह मुझमें नहीं थी। थोड़ा-सा धन कर्ज़ के रूप में मुझे देना। मैं और तुम्हारे भाई कोई व्यापार शुरू करेंगे और अपना पेट भरते हुए थोडे ही समय के अंदर तुम्हारी रक़म तुम्हें लौटा देंगे।''

श्रीपाल ने कहा, ‘‘अभी आपके हाथ में धन नहीं रहा, इसलिए आप ऐसी बातें कर रहे हैं। धन हाथ में आ जाए तो अपनी पुरानी पद्धति को ही अमल में लायेंगे। इसलिए आप सब मेरे ही साथ रहिये, किसी प्रकार की कमी आने नहीं दूँगा। परंतु हाँ, एक शर्त अवश्य है। जब तक आप यहाँ रहेंगे तब तक आपमें से कोई भी भगवान की पूजा और दान-धर्म नहीं करेंगे।''

बेटे की इन बातों पर धनपाल ने नाराज़ हुए बिना, शांत होकर कहा, ‘‘जब तक जीवित हूँ, भक्ति बिना मुझसे रहा नहीं जायेगा।'' यह कहते हुए वह दूसरों के साथ वहाँ से निकल पड़ा।

नास्तिक होते हुए भी बडे बेटे ने उसकी इज्जत की, अच्छी आवभगत की, इसकी धनपाल को खुशी थी। पर उसे यह ग़म खाये जा रहा था कि श्रीपाल ने धन देकर सहायता करने से इनकार कर दिया। उससे यह धक्का सहा नहीं गया और बीमार पड़ गया। सही इलाज न होने के कारण धनपाल की शारीरिक स्थिति दिन व दिन बिगड़ने लगी। ऐसी परिस्थितियों में अंगद नामक एक रामभक्त उस गाँव में आया। वह राम की महानता का प्रचार करने लगा। गाँव के सबके सब मानने लगे कि जिस घर में उसका पदार्पण होता है, वहाँ शुभ ही शुभ होता है।


गोपाल और गुणपाल को जब यह समाचार मालूम हुआ तब उन्होंने अंगद को अपने घर बुलाया। वहाँ खाट पर लेटे पडे धनपाल को देखकर अंगद ने कहा, ‘‘राम को तुमने ठेस पहुँचायी। इसी कारण तुम्हारी यह दुर्दशा हुई।''

धनपाल ने दीनता के साथ उसे देखते हुए कहा, ‘‘मेरा बड़ा बेटा नास्तिक है। पिता होने के नाते उसकी इस भूल का मैं ही जिम्मेदार हूँ। आप ही बताइये कि इस भूल का परिहार कैसे करूँ?''

‘‘तुमने अपने बेटों की संपत्ति उन्हें नहीं देकर खर्च कर दिया। तुम्हारे इस काम पर क्या भगवान को कष्ट नहीं होगा? तुम संपत्ति को बरबाद कर रहे हो, इसीलिए तुम्हारा बड़ा बेटा नास्तिक हो गया, कंजूस हो गया। समझने की कोशिश करो।''

गुणपाल ने कहा, ‘‘महोदय, मेरे पिताश्री पुण्य कार्यों पर ही खर्च करते थे। फिर भी हम कष्ट सहते जा रहे हैं। मेरा बड़ा भाई नास्तिक है, पर करोडपति बनकर सुखों का अनुभव कर रहा है। क्या यही भगवान का न्याय है?''

अंगद ने गुणपाल के कंधे को थपथपाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे बडे भाई ने भगवान का विश्वास नहीं किया, पर उसने भगवान का दूषण भी नहीं किया । कंजूस है, अतः अपात्र दान भी नहीं किया। इसी कारण तुम सबों का पुण्य उसे प्राप्त हुआ है ।''

सुरुचि ने अंगद से कहा, ‘‘आप जैसा कहेंगे, भविष्य में ऐसा ही करेंगे। पहले आप मेरे पति के स्वस्थ होने का उपाय बताइये।''

‘‘तुम्हारे पति को वज्र भस्म का सेवन करना होगा। उसे तैयार करने के लिए एक लाख रुपये के मूल्य का वज्र चाहिये।'' अंगद ने कहा।

सुरुचि, गोपाल, गुणपाल यह सुनकर स्तंभित रह गये। भला इस स्थिति में एक लाख रुपये लाना कैसे संभव हो सकता है। तब अंगद ने उनसे कहा, ‘‘धन जुटा नहीं सकते तो एक दूसरा उपाय भी है। तुममें से कोई एक हृदयपूर्वक भगवान का विश्वास करके धनपाल के स्वास्थ्य के लिए एक पूरी रात राम के मंदिर में प्रार्थना करो। वे तुरंत चंगे हो जायेंगे। प्रार्थना करनेवाले तुम में से कोई एक हो सकता है या गाँववालों में से कोई एक।''


गोपाल, गुणपाल ने अलग-अलग उसी रात को राम के मंदिर में जाकर पिता के स्वास्थ्य के लिए प्रार्थनाएँ कीं। दूसरे दिन सुरुचि ने जाकर प्रार्थना की। फिर भी कोई फल नहीं निकला। गाँव के बहुत लोगों ने भी प्रार्थना की। पर धनपाल के स्वास्थ्य में थोड़ा भी सुधार नहीं हुआ।

ऐसी स्थिति में श्रीपाल अंगद से मिला और कहा, ‘‘मैं अपने पिताश्री की बहुत इज्जत करता हूँ। आपको लाख रुपये दूँगा। वज्र भस्म तैयार करके उन्हें स्वस्थ कीजिये।''

अंगद ने हँसते हुए कहा, ‘‘तुम कंजूस हो। हृदयपूर्वक धन राशि देने पर ही मेरा वज्र भस्म काम करेगा। इसके लिए तुम्हें इस रात को राम के मंदिर में रहना होगा और भगवान पर संपूर्ण विश्वास रखकर प्रार्थना करनी होगी। तुम्हारे पिता के स्वस्थ होने की संभावना है।''

श्रीपाल ने अपनी सहमति दी। पर गाँववालों ने यह कहकर उसे मंदिर में आने से मना किया कि एक नास्तिक को वे मंदिर में प्रवेश करने नहीं देंगे। रात होते ही उन्होंने मंदिर के दरवाज़े भी बंद कर दिये।

श्रीपाल मंदिर के सामने खड़ा हो गया और प्रार्थना करने लगा, ‘‘हे राम, कहते हैं कि आप पिता की आज्ञा का पालन करने के लिए राज्य को त्यज कर अरण्य चले गये। अगर यह सच हो तो, पिता के स्वास्थ्य के लिए प्रार्थनाएँ करने के लिए मुझे, मंदिर में प्रवेश होने दीजिये।''

दूसरे ही क्षण मंदिर के दरवाज़े आप ही आप खुल गये। श्रीपाल मंदिर के अंदर गया और श्रीराम की मूर्ति के सामने खड़े होकर प्रार्थना करने लगा।

इससे बहुत पहले ही धनपाल की बीमारी दूर हो गयी। बेहद खुश होकर वह सपरिवार मंदिर आया और श्रीपाल को बडे ही प्यार से गले लगाया।


वेताल ने कहानी बता कर राजा विक्रमार्क से कहा, ‘‘राजन्, परम भक्त धनपाल ने अपनी पूरी संपत्ति खो दी, और नास्तिक श्रीपाल करोड़पति बन गया। क्या यह विचित्र नहीं लगता? धनपाल की पत्नी और उसके दोनों बेटों ने देव प्रार्थना की, फिर भी वह स्वस्थ नहीं हो पाया। परंतु एक नास्तिक की प्रार्थना सफल हुई। क्या यह आपको विचित्र, अस्वाभाविक नहीं लगता? मेरे इन संदेहों के समाधान जानते हुए भी चुप रह जाओगे तो तुम्हारे सिर के टुकड़े-टुकड़े हो जायेंगे।''

विक्रमार्क ने वेताल के संदेहों को दूर करने के उद्देश्य से कहा, ‘‘देवभक्ति और आर्थिक स्थिति में कोई संबंध नहीं होता। पूर्व जन्म कर्म इसके कारण हैं। धनपाल की पत्नी और उसके दो बेटे जो कष्ट झेल रहे हैं, उनके कारण भगवान पर उनका विश्वास उठ गया। इसी वजह से उनकी प्रार्थनाओं का कोई फल नहीं हुआ। गाँववालों ने भी तकलीफ़ों में उसकी सहायता नहीं की, इसी कारण उनकी प्रार्थनाएँ भी व्यर्थ हुईं। अब रही श्रीपाल की बात। पिता की पद्धति को देखते हुए उसे इस बात का भय हो गया कि देवभक्ति से अपार धन खर्च होता है। इसीलिए वह नास्तिक हो गया। वह अपने पिता को चाहता था, उसका आदर करता था, इसीलिए वज्र भस्म के लिए एक लाख रुपये देने को तैयार हो गया। चित्त शुद्ध हो और सत्कार्य करने को आगे आयें तो भगवान ऐसों की प्रार्थनाएँ सुनते हैं। श्रीपाल के विषय में भी यही हुआ।''

राजा के मौन-भंग में सफल वेताल शव सहित ग़ायब हो गया और फिर से पेड़ पर जा बैठा।


(आधारः ‘‘वसुंधरा'' की रचना)
संकलन व् प्रस्तुति : राजेश मिश्रा, कोलकता 

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

बुद्धि से बड़ा कोई भी बल नहीं

कहानी : बुद्धि से बड़ा बल भी नहीं



एक गुफा में एक बड़ा ताकतवर शेर रहता था। वह प्रतिदिन जंगल के अनेक जानवरों को मार डालता था। उस वन के सारे जानवर उसके डर से काँपते रहते थे। एक बार जानवरों ने सभा की। उन्होंने निश्चय किया कि शेर के पास जाकर उससे निवेदन किया जाए। जानवरों के कुछ चुने हुए प्रतिनिधि शेर के पास गए। जानवरों ने उसे प्रणाम किया।

फिर एक प्रतिनिधि ने हाथ जोड़कर निवेदन किया, ‘आप इस जंगल के राजा है। आप अपने भोजन के लिए प्रतिदिन अनेक जानवरों को मार देते हैं, जबकि आपका पेट एक जानवर से ही भर जाता है।’

शेर ने गरजकर पूछा-‘तो मैं क्या कर सकता हूँ?’

सभी जानवरों में निवेदन किया, ‘महाराज, आप भोजन के लिए कष्ट न करें। आपके भोजन के लिए हम स्वयं हर दिन एक जानवर को आपकी सेवा में भेज दिया करेंगे। आपका भोजन हर दिन समय पर आपकी सेवा से पहुँच जाया करेगा।’

शेर ने कुछ देर सोचा और कहा- ‘यदि तुम लोग ऐसा ही चाहते हो तो ठीक है। किंतु ध्यान रखना कि इस नियम में किसी प्रकार की ढील नहीं आनी चाहिए।’

इसके बाद हर दिन एक पशु शेर की सेवा में भेज दिया जाता था। एक दिन शेर के पास जाने की बारी एक खरगोश की आ गई। खरगोश बुद्धिमान था। उसने मन-ही मन सोचा- ‘अब जीवन तो शेष है नहीं। फिर मैं शेर को खुश करने का उपाय क्यों करुँ? ऐसा सोचकर वह एक कुएँ पर आराम करने लगा। इसी कारण शेर के पास पहुँचने में उसे बहुत देर हो गई।’

खरगोश जब शेर के पास पहुँचा तो वह भूख के कारण परेशान था। खरगोश को देखते ही शेर जोर से गरजा और कहा, ‘एक तो तू इतना छोटा-सा खरगोश है और फिर इतनी देर से आया है। बता, तुझे इतनी देर कैसे हुई?’


खरगोश बनावटी डर से काँपते हुए बोला- ‘महाराज, मेरा कोई दोष नहीं है। हम दो खरगोश आपकी सेवा के लिए आए थे। किंतु रास्ते में एक शेर ने हमें रोक लिया। उसने मुझे पकड़ लिया।’

मैंने उससे कहा- ‘यदि तुमने मुझे मार दिया तो हमारे राजा तुम पर नाराज होंगे और तुम्हारे प्राण ले लेंगे।’ उसने पूछा-‘कौन है तुम्हारा राजा?’ इस पर मैंने आपका नाम बता दिया।

यह सुनकर वह शेर क्रोध से भर गया। वह बोला, ‘तुम झूठ बोलते हो।’ इस पर मैंने कहा, ‘नहीं, मैं सच कहता हूँ तुम मेरे साथी को बंधक रख लो। मैं अपने राजा को तुम्हारे पास लेकर आता हूँ।’

खरगोश की बात सुनकर दुर्दांत शेर का क्रोध बढ़ गया। उसने गरजकर कहा, ‘चलो, मुझे दिखाओ कि वह दुष्ट कहाँ रहता है?’

खरगोश शेर को लेकर एक कुँए के पास पहुँचा। खरगोश ने चारों ओर देखा और कहा, ‘महाराज, ऐसा लगता है कि आपको देखकर वह शेर अपने किले में घुस गया।’

शेर ने पूछा, ‘कहां है उसका किला?’

खरगोश ने कुएँ को दिखाकर कहा, ‘महाराज, यह है उस शेर का किला’

खरगोश स्वयं कुएँ की मुँडेर पर खड़ा हो गया। शेर भी मुँडेर पर चढ़ गया। दोनों की परछाई कुएँ के पानी में दिखाई देने लगी। खरगोश ने शेर से कहा, ‘महाराज, देखिए। वह रहा मेरा साथी खरगोश। उसके पास आपका शत्रु खड़ा है।’

शेर ने दोनों को देखा। उसने भीषण गर्जन किया। उसकी गूँज कुएँ से बाहर आई। बस, फिर क्या था! देखते ही देखते शेर ने अपने शत्रु को पकड़ने के लिए कुएँ में छलाँग लगा दी और वहीं डूबकर मर गया।

(साभार: पंचतंत्र की शिक्षाप्रद कहानियां, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

निर्बल ब्राह्मण ने शत्रुओं के आपसी विवाद का लाभ उठाया

कहानी : शत्रुओं के परस्पर विवाद से लाभ



किसी नगर में द्रोण नाम का एक निर्धन ब्राह्मण रहा करता था। उसका जीवन भिक्षा पर ही आधारित था। अतः उसने अपने जीवन में न कभी उत्तम वस्त्र धारण किए थे और न ही अत्यंत स्वादिष्ट भोजन किया था। पान-सुपारी आदि की तो बात ही दूर है। इस प्रकार निरंतर दुःख सहने के कारण उसका शरीर बड़ा दुबला-पतला हो गया था।

ब्राह्मण की दीनता को देखकर किसी यजमान ने उसको दो बछड़े दे दिए। किसी प्रकार मांग-मांगकर उसने जन बछड़ों को पाला-पोसा और इस प्रकार वे जल्दी ही बड़े और हृष्ट-पुष्ट हो गए। ब्राह्मण उनको बेचने की सोच रहा था तभी उन दोनों बछड़ों को देखकर एक दिन किसी चोर ने सोचा कि आज उसको उन बछड़ों को चुरा लेना चाहिए नहीं तो ये ब्राह्मण उनको बेच देगा। अतः उनको बांधकर लाने के लिए रस्सी आदि लेकर वह रात्रि में घर से निकल पड़ा।

इस प्रकार सोचकर वह चोरी करने जा रहा था कि आधे मार्ग में उसको एक भयंकर व्यक्ति दिखाई दिया। उस व्यक्ति के प्रत्येक अंग से भयंकरता का आभास हो रहा था. उसे देखकर चोर घबराकर एक बार तो वापस जाना का विचार कर बैठा, किन्तु फिर भी उसने साहस करके उससे पूछ ही लिया, “आप कौन हैं?” “मैं तो सत्यवचन नामक ब्रह्मराक्षस हूं, किन्तु तुम कौन हो?” “मैं क्रूरकर्मा नामक चोर हूं। मैं उस दरिद्र ब्राह्मण के दोनों बछड़ों को चुराने के उद्देश्य से घर से चला हूं।” राक्षस बोला-“मित्र! मैं छः दिनों से भूखा हूं। इसलिए चलो आज उसी ब्राह्मण को खाकर मैं अपनी भूख मिटाऊंगा।

अच्छा ही हुआ कि हम दोनों के कार्य एक-से ही हैं, दोनों को जाना भी एक ही स्थान पर हैं।” इस प्रकार वे दोनों ही उस ब्राह्मण के घर जाकर एकान्त स्थान पर छिप गए। और अवसर की प्रतीक्षा करने लगे। जब ब्राह्मण सो गया तो उसको खाने के लिए उतावले राक्षस से चोर ने कहा, “आपका यह उतावलापन अच्छा नहीं है। मैं जब बछड़ों को चुराकर यहां से चला जाऊँ तब आप उस ब्राह्मण को खा लेना।”

राक्षस बोला, “बछड़ों के रम्भाने से यदि ब्राह्मण की नींद खुल गई तो मेरा यहां आना ही व्यर्थ हो जाएगा।” “और ब्राह्मण को खाते समय कोई विघ्न पड़ गया तो मैं बछड़ों को फिर किस प्रकार चुरा पाऊंगा। इसलिए पहले मेरा काम होना दीजिए।” इस प्रकार उन दोनों का विवाद बढ़ता ही गया था। कुछ समय बाद दोनों जोर-जोर से चिल्लाने लगे तो उससे ब्राह्मण की नींद खुल गई।

उसे जगा हुआ देखकर चोर उसके पास गया और उसने कहा, “ब्राह्मण! यह राक्षस तुम्हें खाना चाहता है।” यह सुनकर राक्षस उसके पास जाकर कहने लगा, “ब्राह्मण! यह चोर तुम्हारे बछड़ों को चुराकर ले जाना चाहता है।”

एक क्षण तक तो ब्राह्मण विचार करता रहा, फिर उठा और चारपाई से उतरकर उसने इष्ट देवता का स्मरण किया। उसने मंत्र-जप किया और उसके प्रभाव से उसने राक्षस को निष्क्रिय कर दिया। फिर उसने लाठी उठाई और उससे चोर को मारने के लिए दौड़ा तो वह भाग गया। इस प्रकार उसने अपने बछड़े भी बचा लिए।

वक्रनाश बोला, “इसलिए मैंने कहा कि कभी-कभी शत्रु भी अपने हितकारक हो जाया करते हैं।” उसके बाद अरिमर्दन ने प्राकरकर्ण से पूछा, “कहिए इस विषय में आपका क्या मत है?” उसने कहा, “देव! यह अवध्य तो है ही। संभव है इसके कारण काकों और उलूकों में चला आ रहा वैर समाप्त होकर परस्पर प्रेम उत्पन्न हो जाए।

कहा भी गया है कि आपस के रहस्यों को जो लोग गुप्त नहीं रखते वे बिल या उदर में रहने वाले सर्पों की भांति शीघ्र ही विनष्ट हो जाते हैं।”

(साभार: पंचतंत्र की शिक्षाप्रद कहानियां, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

दो रोटी की खातिर सपनों में खोए तीन साधु

(भारतीय साहित्य की नीति कथाओं का विश्व में महत्वपूर्ण स्थान है। पंचतंत्र उनमें प्रमुख है। पंचतंत्र की रचना विष्णु शर्मा नामक व्यक्ति ने की थी। उन्होंने एक राजा के मूर्ख बेटों को शिक्षित करने के लिए इस पुस्तक की रचना की थी। पांच अध्याय में लिखे जाने के कारण इस पुस्तक का नाम पंचतंत्र रखा गया। इस किताब में जानवरों को पात्र बना कर शिक्षाप्रद बातें लिखी गई हैं। इसमें मुख्यत: पिंगलक नामक सिंह के सियार मंत्री के दो बेटों दमनक और करटक के बीच के संवादों और कथाओं के जरिए व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा दी गई है। सभी कहानियां प्राय: करटक और दमनक के मुंह से सुनाई गई हैं।)

कहानी : तीन साधु



ज्ञान की खोज में एक बार तीन साधु हिमालय पर जा पहुंचे। वहां पहुंचकर तीनों साधुओं को बहुत भूख लगी। देखा तो उनके पास तो मात्र दो ही रोटियां थी। उन तीनों ने तय किया कि वो भूखे ही सो जाएंगे। ईश्वर जिसके सपने में आकर रोटी खाने का संकेत देंगे वो ही ये रोटियां खाएगा। ऐसा कहकर तीनों साधु सो गए।

आधी रात को तीनों साधु उठे और एक-दूसरे को अपना-अपना सपना सुनाने लगे। पहले साधु ने कहा- मैं सपने में एक अनजानी जगह पहुंचा वहां बहुत शांति थी और वहां मुझे ईश्वर मिले। और उन्होंने मुझे कहा कि तुमने जीवन में सदा त्याग ही किया है। इसलिए ये रोटियां तुम्हें ही खानी चाहिए।

दूसरे साधु ने कहा कि- मैंने सपने में देखा कि भूतकाल में तपस्या करने के कारण में महात्मा बन गया हूं और मेरी मुलाकात ईश्वर से होती है और वे मुझे कहते हैं कि लंबे समय तक कठोर तप करने के कारण रोटियों पर सबसे पहला हक तुम्हारा है, तुम्हारे मित्रों का नहीं।

अब तीसरे साधु की बारी थी उसने कहा मैंने सपने में कुछ नहीं देखा। क्योंकी मैने वो रोटियां खा ली हैं। यह सुनकर दोनों साधु क्रोधित हो गए। उन्होंने तीसरे साधु से पूछा- यह निर्णय लेने से पहले तुमने हमें क्यों नहीं उठाया? तब तीसरे साधु ने कहा कैसे उठाता? तुम दोनों तो ईश्वर से बातें कर रहे थे। लेकिन ईश्वर ने मुझे उठाया और भूखे मरने से बचा लिया।

बिल्कुल सही कहा गया है कि जीवन-मरण का प्रश्न हो तो कोई किसी का मित्र नहीं होता व्यक्ति वही काम करता है जिससे उसका जीवन बच सके।

(साभारः पंचतंत्र की मनोरंजक कहानियाँ, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

मतलबी शेर ने की मतलब की दोस्ती

(भारतीय साहित्य की नीति कथाओं का विश्व में महत्वपूर्ण स्थान है। पंचतंत्र उनमें प्रमुख है। पंचतंत्र की रचना विष्णु शर्मा नामक व्यक्ति ने की थी। उन्होंने एक राजा के मूर्ख बेटों को शिक्षित करने के लिए इस पुस्तक की रचना की थी। पांच अध्याय में लिखे जाने के कारण इस पुस्तक का नाम पंचतंत्र रखा गया। इस किताब में जानवरों को पात्र बना कर शिक्षाप्रद बातें लिखी गई हैं। इसमें मुख्यत: पिंगलक नामक शेर के सियार मंत्री के दो बेटों दमनक और करटक के बीच के संवादों और कथाओं के जरिए व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा दी गई है। सभी कहानियां प्राय: करटक और दमनक के मुंह से सुनाई गई हैं।)

कहानी : मतलबी शेर

 
उत्तर दिशा में एक अर्बुद नाम का पर्वत है उस पर्वत के निचे एक गुफा बनी हुई है उसमें एक शेर रहता था। जब रात में शेर गहरी नींद में होता था तो एक चूहा चुपके से आकर उसकी गर्दन के बाल कुतर जाता था। प्रातः जब शेर उठता और अपने कुतरे हुए बालों को देखता तो उसे बड़ा क्रोध आता। किंतु वह विवश था क्योंकी चूहा उसकी पकड़ में नहीं आता था।

शेर दिन-रात सोचता रहता था कि कैसे एक छोटे से शत्रु को अपने वश में करूं? एक दिन वह वन छोड़कर गांव की ओर गया। वहां उसे एक बिलाव मिल गया। शेर किसी तरह उस बिलाव को विश्वास दिलाकर अपनी गुफा में ले गया। गुफा में लाकर शेर ने उसका खूब स्वागत सत्कार किया। वह बिलाब शेर के स्वागत सत्कार से काफी खुश हो गया और उसी दिन से वह शेर के साथ गुफा में रहने लगा।

चूहे को जब यह पता चला कि उसका एक शत्रु गुफा में आ गया है तो उस दिन से उसने रात में निकलना ही बंद कर दिया। अब शेर की रातें भी आराम से बीतने लगी। जब कभी उसे चूहे की चूं-चूं सुनाई देती वह बिलाव को और भी बढ़िया मांस खिला देता। ताकि मांस के प्रलोभन में बिलाव वहीं रहे गुफा छोड़कर न जाए।

बिलाव भी मजे में था क्योंकी उसे खाने की चिंता नहीं रहती थी। एक दिन शेर शिकार की तलाश में बाहर गया हुआ था और बिलाब गुफा में ही थी। शेर के जाते ही चूहा बाहर निकला, बाहर निकलते ही बिलाव की नजर उस पर पड़ी। बस, फिर क्या था एक ही छलांग में उसने चूहे को दबोच लिया और मारकर खा गया। शेर ने जब कई दिनों तक चूहे की आवाज नहीं सुनी तो वो समझ गया कि बिलाव ने उसका काम तमाम कर डाला है। अब शेर निश्चिंत हो चुका था।

अब चूहा ही नहीं रहा तो उसे बिलाव की क्या जरूरत थी। उसी दिन से शेर ने बिलाव की उपेक्षा करना शुरू कर दिया था। कभी वह उसे खाने को भोजन देता और कभी नहीं। डर के मारे बिलाब कुछ भी कह नहीं सकता था। भोजन नहीं मिलने से धीरे-धीरे बिलाव कमजोर होने लगा और भूखे रहने के कारण उसकी एक दिन मृत्यु हो गई।

इसलिए कहा गया है कि साथ हमेशा बराबरी का ही अच्छा लगता है बलशाली की न दोस्ती अच्छी और न दुश्मनी।

(साभारः पंचतंत्र की मनोरंजक कहानियाँ, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

बेरहम रानी और हिरनी का प्रेम

कहानी



(भारतीय साहित्य की नीति कथाओं का विश्व में महत्वपूर्ण स्थान है। पंचतंत्र उनमें प्रमुख है। पंचतंत्र की रचना विष्णु शर्मा नामक व्यक्ति ने की थी। उन्होंने एक राजा के मूर्ख बेटों को शिक्षित करने के लिए इस पुस्तक की रचना की थी। पांच अध्याय में लिखे जाने के कारण इस पुस्तक का नाम पंचतंत्र रखा गया। इस किताब में जानवरों को पात्र बना कर शिक्षाप्रद बातें लिखी गई हैं। इसमें मुख्यत: पिंगलक नामक सिंह के सियार मंत्री के दो बेटों दमनक और करटक के बीच के संवादों और कथाओं के जरिए व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा दी गई है। सभी कहानियां प्राय: करटक और दमनक के मुंह से सुनाई गई हैं।)

सांझ हो गई थी पंछी अपने घौंसले से घर लौट रहे थे। लेकिन एक पेड़ के नीचे खड़ी हिरनी की उदासी गहरी होती जा रही थी। वह गुमसुम सी डूबते सूरज को देख रही थी।

हिरनी को उदास देख हिरण उसके पास आया और बोला- मैं बहुत देर से देख रहा हूं आज तुम बहुत उदास हो। मुझे अपनी चिंता का कारण बताओ। हिरन की आवाज सुनते ही हिरनी की आंखे छलछला गईं। वह साहस बटोर कर बोली- सुना है, कल राजा के यहां राजकुमार का जन्मदिन मनाया जाने वाला है। कल बड़ा भारी उत्सव होगा। और इस अवसर पर तरह-तरह के पकवान बनेंगे। यह कहकर हिरनी जोर-जोर से रोने लगी।

एक क्षण तक हिरण मौन रहा। फिर धीरज के साथ उसने कहा- इतनी छोटी सी बात के लिए तू दुःखी हो रही है।हम सब राजा के जंगल में रहते हैं। इसलिए हम उनके सेवक हैं। उनकी खुशी के लिए अगर मुझे बलिदान भी देना पड़े तो ये मेरा सौभाग्य होगा। इसी बहाने में उनके ऋण से मुक्त हो जाऊंगा। वैसे भी एक दिन मरना ही है।


किसी का शिकार बनने से तो अच्छा ही है कि राजकुमार के जन्मदिन पर मरूं। हिरणी बोली आपके जाने से मेरी दुनिया सूनी हो जाएगी। मैं कैसे जीऊंगी?

हम आज रात ही ये राज्य छोड़ देते हैं और ऐसी जगह चलते हैं जहां दूर-दूर तक कोए न हो। लेकिन हिरण पर उसकी बात का कोई असर नहीं हुई।

दूसरे दिन जैसे ही सूरज निकला हिरणी का दिल भारी होने लगा। थोड़ी ही देर में दो सैनिक तलवारें लिए उसके सामने खड़े थे। उन्हें देखकर हिरनी ने आंखे बंदकर लीं। जब उसने आंखे खोली तो वहां सैनिक थे और न ही हिरण। वह बेसुध हो गई। उस दिन उसने कुछ नहीं खाया-पिया। बस, हिरण की याद में रोती रही।

शाम को साहस करके हिरनी महम लें पहुंची। वहां जन्मोत्सव खत्म हो चुका था। वह महारानी के पास गई और उससे कहा- मैं आपके राज्य की हिरनी हूं। आज के महोत्सव में मेरे पति ने अपने प्राण त्याग कर आपकी रसोई की शोभा बढ़ाई है। उसके सिवा मेरा कोई नहीं था। मेरी आपसे विनती है कि आप मुझे हिरन की खाल दे दें। मैं उसे देखकर ही जी लूंगी।


लेकिन निर्दयी रानी ने हिरनी की प्रार्थना स्वीकार नहीं की। रानी ने कहा- उस खाल की तो मैं खंजड़ी बनवाऊंगी। जिसे बजा-बजा कर मेरा बेटा खेलेगा।

हिरनी दुःखी होती हुई वहां से चली गई। उसके बाद जब भी महल से खंजड़ी बजने की आवाज आती हिरनी उसे सुनकर घंटों आंसू बहाती।

(साभारः पंचतंत्र की मनोरंजक कहानियाँ, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

जुलाहे को भारी पड़ी मूर्खों की सीख

(भारतीय साहित्य की नीति कथाओं का विश्व में महत्वपूर्ण स्थान है। पंचतंत्र उनमें प्रमुख है। पंचतंत्र की रचना विष्णु शर्मा नामक व्यक्ति ने की थी। उन्होंने एक राजा के मूर्ख बेटों को शिक्षित करने के लिए इस पुस्तक की रचना की थी। पांच अध्याय में लिखे जाने के कारण इस पुस्तक का नाम पंचतंत्र रखा गया। इस किताब में जानवरों को पात्र बना कर शिक्षाप्रद बातें लिखी गई हैं। इसमें मुख्यत: पिंगलक नामक शेर के सियार मंत्री के दो बेटों दमनक और करटक के बीच के संवादों और कथाओं के जरिए व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा दी गई है। सभी कहानियां प्राय: करटक और दमनक के मुंह से सुनाई गई हैं।)

कहानी : मूर्ख की सीख बड़ी दुःखदायी


किसी नगर में मन्थर नाम का एक जुलाहा रहता था। एक दिन जब वह कपड़ा बना रहा था तो उसी समय खड्डी आदि उसके सारे उपकरण टूट गए। तब उसने कुल्हाड़ी उठाई और लकड़ी काटने के लिए घर से निकल पड़ा। घूमता हुआ वह समुद्र के किनारे पहुंच गया। वहां उसे शीशम का वृक्ष दिखाई दिया।

जुलाहा उसकी लकड़ी काटने के लिए उस वृक्ष पर चढ़ गया। उस वृक्ष पर एक यक्ष रहता था। जुलाहे ने काटने के लिए ज्योंही कुल्हाड़ी उठाई कि तभी वह बोला, “मैं इस वृक्ष पर रहता हूं, तुम इसको नहीं काट सकते।” जुलाहा बोला, “मैं क्या करूं, विवश हूं। मेरे सारे उपकरण टूट गए हैं। मुझे उसके लिए लकड़ी चाहिए। उपकरणों के अभाव में मेरा सारा परिवार भूखों मर रहा है। आप तो किसी भी अन्य वृक्ष पर जाकर निवास कर सकते हैं।” यक्ष बोला, “मैं तुम पर प्रसन्न हूं। तुम मुझसे कोई वरदान मांग लो किन्तु इस वृक्ष को काटो नहीं।” जुलाहा बोला, “यदि यही बात है तो फिर मैं जाकर अपनी पत्नी और मित्रों आदि से पूछकर आता हूं, उसके बाद ही आप वर दीजिए।”

जुलाहा घर गया तो मार्ग से उसको अपना मित्र नाई मिल गया। उसको उसने सारी कथा सुनाई और फिर उसने पूछने लगा, “बोलो, मुझे उससे क्या वरदान मांगना चाहिए।” नाई बोला, “यदि यही बात है तो फिर राज्य की मांगो, तुम राजा बन जाना और मैं तुम्हारा मंत्री बन जाऊंगा।” “तुम्हारा कहना ठीक है।

मैं अपनी पत्नी से पूछ लेता हूं।” नाई बोला, “क्या बात करते हो! स्त्री से परामर्श करना शास्त्रविरुद्ध है। स्त्रियों में बुद्धि ही कितनी होती है? कहा भी है जिस घर में स्त्री का प्राधान्य होता है, जिस घर का स्वामी धूर्त, जुआरी या बालक होता है, वह घर शीघ्र ही विनष्ट हो जाता है।” जुलाहा बोला, “फिर भी मैं अपनी पत्नी से अवश्य पूछूंगा। वह बड़ी ही नेक पतिव्रता स्त्री है।”

जुलाहा नाई के पास से चलकर अपनी पत्नी के पास आया। उसने सारा वृत्तान्त सुना दिया और यह भी कहा कि उसके मित्र नाई ने तो राज्य की बात कही है।

उसकी पत्नी बोली, “छिः! नाई की भी कोई बुद्धि होती है। कहा गया है कि नाई, भाट, जैसे चतुर व्यक्ति से तो कभी कोई परामर्श करना ही नहीं चाहिए। और फिर राज्य बड़ा कष्टकारक होता है। देखो न, राज्य के लिए राम को वन जाना पड़ा। राज्य के लिए यदुवंशियों का विनाश हुआ। राजा नल ने राज्य के लिए ही कष्ट झेले। सौदास राजा को शाप मिला। राज्य के लिए परशुराम ने कार्तवीर्य को मार डाला। राज्य के लिए रावण की क्या दुर्दशा हुई।

समझदार व्यक्ति को कभी राज्य की इच्छा नहीं करनी चाहिए।” “यह तो ठीक है। तब मैं उनसे क्या मांगू?” “तुम नित्य एक कपड़ा बुनते हो, उससे हमारा घर का खर्च चलता है। तुम यक्ष से दो हाथ तथा एक सिर और मांग लो, इससे दुगुना काम होगा। बस एक के मूल्य से घर का खर्च चलेगा और दूसरे के मूल्य से अन्य खर्च चलेंगे। तब हम अपनी जाति के लोगों में प्रतिष्ठापूर्वक रह सकेंगे।”

जुलाहे को यह बात भा गई और वह यक्ष के पास जाकर विनीत भाव से बोला, “यदि आप मुझे वरदान देना ही चाहते हैं तो मुझे दो भुजाएं तथा एक सिर और दे दीजिए।” यक्ष ने कहा, “तथास्तु।”

तुरन्त ही जुलाहा दो सिर और चार हाथ वाला हो गया। उस रूप में जब वह घर के लिए चला तो लोगों ने उसको राक्षस समझकर मारना आरम्भ कर दिया। उनकी मार खाकर वह वहीं गिरकर मर गया।

यह कथा सुनाकर चक्रधर ने कहा, “आप ठीक ही कहते हैं। जो व्यक्ति असम्भव की आशा और अनागत की चिन्ता करता है वह मुसीबत में पड़ता है।”

(साभारः पंचतंत्र की कहानियां, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

जीत गई बहादुर बकरी की ममता

कहानी

(भारतीय साहित्य की नीति कथाओं का विश्व में महत्वपूर्ण स्थान है। पंचतंत्र उनमें प्रमुख है। पंचतंत्र की रचना विष्णु शर्मा नामक व्यक्ति ने की थी। उन्होंने एक राजा के मूर्ख बेटों को शिक्षित करने के लिए इस पुस्तक की रचना की थी। पांच अध्याय में लिखे जाने के कारण इस पुस्तक का नाम पंचतंत्र रखा गया। इस किताब में जानवरों को पात्र बना कर शिक्षाप्रद बातें लिखी गई हैं। इसमें मुख्यत: पिंगलक नामक शेर के सियार मंत्री के दो बेटों दमनक और करटक के बीच के संवादों और कथाओं के जरिए व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा दी गई है। सभी कहानियां प्राय: करटक और दमनक के मुंह से सुनाई गई हैं।)


एक बहादुर बकरी थी वह रोज सुबह जंगल में चरने जाया करती और सूर्यास्त होने तक लौट आती। कुछ समय बाद उसके चार बच्चे हुए। उसने अपने बच्चों का नाम आले, बाले, छुन्नु और मुन्नु रख दिया। एक सियार उन बच्चों को खाने लिए वहीं चक्कर लगाया करता रहता। बकरी का चरने के लिए जंगल जाना जरूरी था।

इसलिए बकरी ने बच्चों को बचाने के लिए एक टटिया (बांस की टाटी से बना घर) बनाई और बच्चों से कहा- जब तक मैं आकर आवाज़ न दूं तब तक ये टटिया मत खोलना।

अब बकरी निश्चिंत होकर जंगल जाती और शाम को आकर आवाज देती- आले टटिया खोल, बाले टटिया खोल, छुन्नु टटिया खोल और मुन्नु टटिया खोल। यह सुनकर ही बच्चे दरवाजा खोलते थे।

एक दिन सियार ने ये सब कुछ सुन लिया। अगले दिन जब बकरी जंगल चली गई तो सियार बकरी के घर पहुंच गया। उसने बकरी की आवाज में कहा- “आले टटिया खोल, बाले टटिया खोल, छुन्नु टटिया खोल और मुन्नु टटिया खोल।”

बच्चों ने सोचा आज मां जल्दी लौट आईं। उन्होंने टटिया का दरवाज खोल दिया। लेकिन सियार को देखकर वे घबरा गए। मौका पाकर सियार बच्चों को खा गया। शाम को जब बकरी घर पहुंची तो टटिया का दरवाजा का खुला देखकर डर गई। वह अंदर गई तो वहां कोई नहीं था। लेकिन जब उसने वहां सियार के पैरों के निशान देखे तो वह समझ गई कि सियार उसके बच्चों को खा गया है।

वह तुरंत बढ़ई के पास गई और अपने सींग पैने करवा लाई। तेली के पास जाकर अपने सींगों को चिकना भी करवा लिया। अब बकरी सियार को ढूंढने लगी। उसे सियार के पेड़ के पास सोता हुआ मिला।

बकरी ने सियार से कहा- ‘मेरे बच्चे लौटा दो’, सियार बोला ‘तेरे बच्चे तो मैंने खा लिए और अब मैं तुझे भी खाउंगा”। बकरी गुस्से में आगे बढ़ी और सियार के पेट में अपने सींग घौंप दिए।

जैसे ही सियार का पेट फटा बकरी के चारों बच्चे बाहर निकल आए। सियार मर चुका था और बकरी बच्चों को लेकर घर चली गई। इसके बाद बकरी ने बच्चों को कान में बताकर जाने लगी कि आज वो कितनी बार गाना गाएगी।

(साभारः पंचतंत्र की मनोरंजक कहानियाँ, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

बहादुर महिला ने खोली घंटी बजाने वाले राक्षस की पोल

 
(भारतीय साहित्य की नीति कथाओं का विश्व में महत्वपूर्ण स्थान है। पंचतंत्र उनमें प्रमुख है। पंचतंत्र की रचना विष्णु शर्मा नामक व्यक्ति ने की थी। उन्होंने एक राजा के मूर्ख बेटों को शिक्षित करने के लिए इस पुस्तक की रचना की थी। पांच अध्याय में लिखे जाने के कारण इस पुस्तक का नाम पंचतंत्र रखा गया। इस किताब में जानवरों को पात्र बना कर शिक्षाप्रद बातें लिखी गई हैं। इसमें मुख्यत: पिंगलक नामक शेर के सियार मंत्री के दो बेटों दमनक और करटक के बीच के संवादों और कथाओं के जरिए व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा दी गई है। सभी कहानियां प्राय: करटक और दमनक के मुंह से सुनाई गई हैं।)


कहानी : राक्षस का अंत


श्रीपर्वत के बीच ब्रह्मपुर नाम का एक नगर था। उस नगर के पास में ही एक घना जंगल था। एक समय की बात है कि एक चोर मंदिर का घंटा चुराकर उसी रास्ते से भाग रहा था। तभी एक बाघ ने उसे देख लिया और उसे अपना शिकार बना लिया। घंटा वहीं पड़ा रह गया और कुछ बंदरों ने उसे उठा लिया और पेड़ पर टांग दिया। बंदरों के लिए घंटा एक अजीब वस्तु थी। सो वो हर समय उसे बजाते रहते थे। ब्रह्मपुर के निवासियों के लिए उस घंटे की आवाज एक पहेली बन गई। इसलिए नगर के कुछ लोग हिम्मत बटोर कर उस जगंल में गए।

वहां जाकर लोगों ने आधा खाया हुआ मनुष्य शरीर देखा और निरंतर घंटे की बजने की आवाज भी सुनी। वे लोग भयभीत होकर वहां से भाग आए और नगर आकर ये प्रचारित कर दिया कि उस नगर में घंटाकर्ण नाम का कोई राक्षस रहता है वह मनुष्यों को मारकर खाता है और घंटा बजाता रहता है।

ब्रह्मपुर के निवासी भयभीत हो गए और धीरे-धीरे नगर को छोड़ कर जाने लगे। उसी नगर में कराला नाम की एक स्त्री रहती थी उसने सोचा भला किसी राक्षस को क्या पड़ी है कि वो मनुष्य को मारकर घंटा बजाए। जरूर इसमें कोई रहस्य है।

एक दिन वह हिम्मत जुटा कर उस वन में गई। वहां उसे वानरों का एक समूह दिखाई दिया। उस समूह का एक वानर घंटा बजा रहा था। यह देखकर वह सारा माजरा समझ गई और उस नगर के राजा के पास पहुंची। राजा से बोली-महाराज यदि आप मुझे कुछ धन दें तो मैं घंटाकर्ण राक्षस को अपने वश में कर सकती हूं।

राजा से धन लेकर कराला अपने घर आ गई और साथ ही बंदरों को पसंद आने वाले फल बाजार से खरीद लाई। दूसरे दिन वह उन फलों को लेकर जंगल में गई। उस समय भी घंटे की आवाज लगातार आ रही थी।

वह आवाज की दिशा में चलती गई और बंदरों के उस समूह तक जा पहुंची। वहां जाकर कराला ने सारे फल बिखेर दिए। फलों को देखकर सारे बंदर नीचे उतर आए और घंटा एक तरफ पटक दिया। कराला जैसा चाहती थी ठीक वैसा ही हुआ।

कराला ने मौका पाकर घंटा उठा लिया। घंटा लेकर वहा सीधे राजदरबार पहुंची और बोली- महाराज, यह लीजिए घंटाकर्ण राक्षस का घंटा। मैंने उन राक्षसों को कीलों से बांध दिया है। अब वह न किसी को मारेगा और न ही किसी को घंटे की आवाज़ सुनाई देगी।

कराला की हिम्मत देखकर राजा बहुत प्रसन्न हुआ। उसने कराला को अनेक उपहार दिए और सम्मान सहित उसे विदा किया।

किसी ने सही कहा है कि हिम्मत और बुद्धि से किया गया हर कार्य सफल होता है।

(साभारः पंचतंत्र की कहानियां, डायमंड प्रकाशन, सर्वाधिकार सुरक्षित।)

बुधवार, 23 नवंबर 2011

पंचतंत्र की कहानियां

सच्चा शासक


कंचन वन में शेरसिंह का राज समाप्त हो चुका था पर वहां बिना राजा के स्थिति ऐसी हो गई थी जैसे जंगलराज हो जिसकी जो मर्जी वह कर रहा था। वन में अशांति, मारकाट, गंदगी, इतनी फैल गई कि वहां जानवरों का रहना मुश्किल हो गया। कुछ जानवर शेरसिंह को याद कर रहे थे कि “जब तक शेरसिंह ने राजपाट संभाला हुआ था सारे वन में कितनी शांति और एकता थी। ऐसे ही चलता रहा तो एक दिन यह वन ही समाप्त हो जाएगा और हम सब जानवर बेघर होकर मारे जाएंगे।” गोलू भालू बोला- “कोई न कोई उपाय तो करना ही होगा- क्यों न सभी कहीं सहमति से हम अपना कोई राजा चुन लें जो शेरसिंह की तरह हमें पुन: एक जंजीर में बांधे और वन में एक बार फिर से अमन शांति के स्वर गूंज उठे।” सभी गोलू भालू की बात से संतुष्ट हो गए। पर समस्या यह थी कि राजा किसे बनाया जाए? सभी जानवर स्वयं को दूसरे से बड़ा बता रहे थे।
सोनू मोर बोली- “क्यों न एक पखवाड़े तक सभी को कुछ न कुछ काम दे दिया जाए तो अपने काम को सबसे अच्छे ढंग से करेगा उसे ही यहां का राजा बना दिया जाएगा।” सोनू स्वीटी की बात से सहमत हो गए और फिर सभी जानवरों को उनकी योग्यता के आधार पर काम दे दिया गया। बिम्पी लोमड़ी को मिट्टी हटाने का काम दिया गया तो भोलू बंदर को पेड़ों पर लगे जाले हटाने का, सोनी हाथी को पत्थर उठाकर एक गङ्ढे में डालने का काम सौंपा गया था और मोनू खरगोश को घास की सफाई की।
जब एक पखवाड़ा बीत गया तो सभी जानवर अपने-अपने कार्यों का ब्यौरा लेकर एक मैदान में एकत्रित हो गए। सभी जानवरों ने अपना काम बड़ी सफाई और मेहनत से पूरा किया था। सिर्फ सोनू हाथी था जिसने एक भी पत्थर गङ्ढे में नहीं डाला था।
अब एक समस्या फिर खड़ी हो गई कि आखिर किसके काम को सबसे अच्छा माना जाए। बुध्दिमान मोनू खरगोश ने युक्ति सुझाई “क्यों न मतदान करा लीया जाए, जिसे सबसे ज्यादा मत मिलेंगे उसे ही हम राजा चुन लेंगे।”
अगले दिन सुबह-सुबह चुनाव रख लिया गया और एक बड़े मैदान में सभी पशु-पक्षी मत देने के लिए उपस्थित हो गए। मतदान समाप्त होने के एक घंटे पश्चात मतों को गिनने का काम शुरु हुआ। यह क्या! सोनू हाथी गिनती में सबसे आगे चल रहा था और जब मतों की गिनती समाप्त हुई तो सोनू हाथी सबसे ज्यादा मतों से विजयी हो गया। सभी जानवर एक दूसरे का मुंह ताक रहे थे।
तभी पक्षीराज गरूण वहां उपस्थित हुए और उपस्थित सभी जानवरों को सम्बोधित करते हुए बोले- ‘सोनू हाथी प्रतिदिन पत्थर लेकर गङ्ढे तक जाता था किंतु जब उसने देखा कि उस गङ्ढे में मेरे अंडे रखे हुए हैं तो वह पत्थरों को उसमें न डालकर पास ही जमीन पर एकत्रित करता रहा। सोनू ने अपने राजा बनने के लालच को छोड़ एक जीव को बचाना ज्यादा उपयोगी समझा। उसकी इस परोपकार की भावना को देखकर हम पक्षियों की भावना को देखकर हम पक्षियों ने तय किया कि जो अपने लालच को छोड़कर दूसरों के सुख-दु:ख का ध्यान रखें वही सच्चे तौर पर शासक बनने का अधिकारी है और चूंकि वन में पक्षियों की संख्या पशुओं से अधिक थी इसलिए सोनू हाथी चुनाव जीत गया।’

शुक्रवार, 16 सितंबर 2011



दशहरे का मेला —पूर्णिमा वर्मन
मौसम बदल रहा था और हल्की-हल्की ठंड पड़ने लगी थी। इसी बीच न जाने कैसे छोटू बीमार पड़ गया। मुहल्ले के सारे बच्चों में उदासी छा गई। सबका दादा और शरारतों की जड़ छोटू अगर बिस्तर में हो तो दशहरे की चहलपहल का मज़ा तो वैसे ही कम हो जाता। ऊपर से अबकी बार मम्मियों को न जाने क्या हो गया था।
रमा आंटी ने कहा कि अबकी बार मेले में खर्च करने के लिए बीस रूपए से ज़्यादा नहीं मिलेंगे, तो सारी की सारी मम्मियों ने बीस रूपए ही मेले का रेट बाँध दिया। मेला न हुआ, आया का इनाम हो गया। बीस रूपए में भला कहीं मेला देखा जा सकता था? यही सब सोचते-सोचते हेमंत धीरे-धीरे जूते पहन रहा था कि नीचे से कंचू ने पुकारा -
'हेमंत, हेमंत चौक नहीं चलना है क्या?' हेमंत और सोनू भागते हुए नीचे उतरे और जल्दी से मोटर की ओर भागे जहाँ बैठा हुआ स्टैकू पहले ही उनका इंतज़ार कर रहा था।
दुर्गापूजा की छुटि्टयाँ हो गई थी। मामा जी के घर के सामने वाले पार्क में हर शाम को ड्रामा होता था। हेमंत, कंचू और सोनू इन छुटि्टयों में शाम को मामा जी के यहाँ जाते थे, जहाँ वे ममेरे भाई स्टैकू के साथ ड्रामा देखते, घूमते फिरते और मनोरंजन करते।
हर बार सबके नए कपड़े सिलते और घर भर में हंगामा मचा रहता। अबकी बार कंचू ने गुलाबी रंग की रेशमी फ्राक सिलाई थी और ऊँची एड़ी की चप्पलें ख़रीदी थीं। आशू और स्टैकू मिलकर बार-बार उसकी इस अलबेली सजधज के लिए उसे चिढ़ा देते।
उधम और शरारतों की तो कुछ बात ही मत पूछो जब सारे भाई बहन इकठ्ठे होते तो इतना हल्ला-गुल्ला मचता कि गर्मी की छुटि्टयों की रौनक भी हल्की पड़ जाती। इस साल भी बच्चों का वही नियम शुरू हो गया था। शाम को वे लोग शहर में लगी रंगीन बत्तियों की रौनक देखते हुए चौक पहुँचे और घर में घुसते ही खाने की मेज पर जम गए। मामी ने खाने का ज़बरदस्त इंतज़ाम किया था। आशू के पसंद की टिक्कियाँ, कंचू की पसंद के आलू और स्टैकू की पसंद की गर्मागर्म चिवड़े-मूँगफली की खुशबू घर में भरी थी। रवि की पसंद के सफ़ेद रसगुल्ले मेज़ पर आए तो सबको रवि की याद आ गई।
'रवि ओ रवि, नाश्ता करने आओ'
मामी ने ज़ोर से आवाज़ दी।
"आया माँ" रवि की आवाज़ सबसे ऊपर वाले कमरे से आई।
"अरे ये रवि ऊपर क्या कर रहा है? कंचू ने अचरज से पूछा।
मामी ने बताया कि अबकी बार नाटक में उसने भी भाग लिया है इसलिए वो ऊपर कार्यक्रम की तैयारी और रिहर्सल में लगा हुआ है।
थोड़ी देर में पूरा मेकअप लगाए हुए टींकू नीचे उतरा तो सभी उसे देखकर खिलखिला कर हँस दिए। टींकू ने शरमा कर मुँह फेर लिया। "हमें अपने नाटक में नहीं बुलाओगे" हेमंत ने पूछा।
"तो क्या तुम्हें हमारे नाटक के टिकट नहीं मिले? " रवि ने अचरज से कहा, "टिकट तो सारे स्टैकू के पास थे।"
"अरे हाँ जल्दी-जल्दी में टिकट मैं तुम्हें देना भूल गया, "स्टैकू ने गिनकर तीन टिकट आशु, सोनू और कंचू के लिए निकाले। सोनू ने पूछा, "बिना टिकट नाटक देखना मना है क्या?" रवि ने कहा "मना तो नहीं है लेकिन कुर्सियाँ हमने टिकट के हिसाब से लगाई हैं।

"अरे तुम लोगों का अभी तक नाश्ता नहीं ख़त्म हुआ, देखो, रामदल के बाजे सुनाई पड़ने लगे। नाश्ता ख़त्म करे बिना घूमने को नहीं मिलेगा। फिर रात के बारह बजे तक तुम लोगों का कोई अतापता नहीं मिलता।" मामी ने रसोई में से ही चिल्लाकर कहा।
जल्दी-जल्दी खा-पीकर वे सब ऊपर के छज्जे पर आ गए। मामा जी ने दल पर फेंकने के लिए ढेर-सी फूलों की डालियाँ ख़रीद ली थी। उन्होंने राम लक्ष्मण पर डालियाँ फेंकी, रामदल का मज़ा लिया और नीचे आ गए। पार्क में पहुँचे तो नाटक शुरू ही होने वाला था। सबने अपनी-अपनी कुर्सियाँ घेर ली। थोड़ी देर में दर्शकों की भीड़ इतनी बढ़ गई कि पूरा पार्क भर गया। कुर्सियों के आसपास खड़े लोग कुर्सियों पर गिरे पड़ते थे, मानो तिल रखने को भी जगह नहीं थीं। इस सबसे घबराकर सोनू घर चलने की ज़िद करने लगा। थोड़ी देर तो वे लोग वहाँ बैठे पर जब उसने अधिक ज़िद की तो वे उठे और भीड़ में से किसी तरह रास्ता बनाते गिरते पड़ते सड़क पर आ गए।
खोमचे वाले हर जगह जमे हुए थे। चूरन, भेलपूड़ी, चाट, आइस्क्रीम और मूँगफली, सबने अपनी छोटी-छोटी ढेर-सी दुकाने खोल ली थीं। मिठाइयों और खिलौनों की भी भरमार थी। सड़क पर खूब हलचल थी और लाउड़स्पीकरों पर ज़ोर-ज़ोर से बजते हुए गाने कान फाड़े डालते थे।
आशू ने एक मूँगफली वाले से मुँगफली ख़रीद कर अपनी सारी जेबें भर लीं और सभी बच्चों ने अपने पसंद की चीज़ें ख़रीदीं। वे घर लौट कर आए तो मामा जी ने कहा, "अब तुम सब कार में बैठो, मैं तुम्हें घर छोड़ आऊँ?"
सिर्फ़ आइस्क्रीम और मूँगफल्ली में ही पंद्रह रुपए खर्च हो गए। फिर बीस रुपए में मेला कैसे देखा जाएगा। मामा जी ने हेमंत को उदास देखकर पूछा, "हेमंत बेटे, तुम्हें रोशनी और नाटक देखकर अच्छा नहीं लगा क्या? इतने उदास क्यों हो?''
सोनू और कंचू बोले, "मामा जी सिर्फ़ हेमंत ही नहीं, हम सभी बच्चे बहुत उदास हैं। एक तो छोटू को बुखार होने के कारण इस बार दशहरे पर हम अपनी फाइवस्टार सर्कस नहीं कर पा रहे हैं, दूसरे हम सबको मेले के लिए अबकी बार सिर्फ़ बीस रुपए मिलेंगे। इतने में मेला कैसे देखा जा सकता है?"
मामाजी मुस्करा कर बोले, "मेले में तुम्हें मिठाइयाँ ही ख़रीदनी होती हैं न? चलो भाई, अबकी बार मिठाई हम ख़रीद देंगे। बीस रुपए जमा करके तुम पुस्तकालय के सदस्य बन जाओ और नियमित रूप से पुस्तकें पढ़ो तो साल भर तुम्हारा ज्ञान भी बढ़ेगा और मनोरंजन भी होगा।"
सोनू ने पूछा, "तो मामा जी, पुस्तकालय में कॉमिक्स भी मिलती हैं क्या?"
"हाँ, हाँ, सब तरह की किताबें होती हैं वहाँ। कॉमिक्स से लेकर विज्ञान तक हर विषय की। कल सुबह तैयार रहना, तो तुम्हें पुस्तकालय दिखा लाऊँगा।
बच्चे घर लौटे तो मेले की मिठाइयाँ भूलकर पुस्तकालय की बातें करने लगे। सामने दुर्गा जी के मंदिर में अष्टमी की आरती के घंटे बजने शुरू हुए तो दादी जी ने याद दिलाया, "आरती लेने नहीं चलोगे क्या?" यह पुकार सुन सभी बच्चे दादी जी के साथ आरती लेने चल दिए।

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

रक्षाबंधन पर विशेष कहानी : कच्चे धागे

भाई- बहन के प्यार की कहानी : कच्चे धागे 

BAHNA NE BHAI KE KALAI PE PYAR BANDHA HAI...
मुझे मेडिकल में एडमिशन मिल गया था ! मैं बहुत खुश थी ! सभी बहुत खुश थे ! एक छोटे से कस्बे से बडे शहर में आना बहुत अच्छा लग रहा था ! हालांकि शहर में मामा-मामी थे ! उनके बेटे यानि बिट्टू भईया थे ! भाभी थी! बच्चे थे ! परंतु पढाई की वजह से मैंने होस्टल में ही रहना ज्यादा अच्छा समझा ! इससे रिश्तेदारी में प्यार भी बना रहता है और किसी को कुछ कहने का मौका भी नहीं मिलता ! बीच बीच में मैं समय निकाल कर मामा-मामी और भाभी-बच्चों से मिल आती थी ! बिट्टू भईया का बहुत अच्छा गारमेंट का शो-रूम था ! अच्छा बिज़नेस था ! लेकिन उनसे कभी भेंट नहीं हो पाती थी ! पक्के बिज़नेसमैन बन गए थे ! पैसे के पीर ! जब भी मैं उनके घर जाती तो भईया अपने शो-रूम में होते ! रात को घर लेट ही आते थे ! उनका बस चलता तो शायद वो रात को भी वहीं सो जाते ! इतवार को और छुट्टी वाले दिन तो उनके शो-रूम में बहुत रश होता था ! सो उनका हाल-चाल भाभी से ही पूछ लेती !

हम तीन बहनें ही हैं ! भाई कोई है नहीं ! मैं सबसे छोटी हूं ! सभी मुझे बहुत प्यार करते हैं ! मामा-मामी के साथ बिट्टू भईया भी कभी कभार हमारे यहां हमें मिलने आते रह्ते थे ! परंतु जब से उन्होंने शो-रूम खोला है उनका आना जाना लगभग न के बराबर ही हो गया था ! दोनो बडी बहने दुबली-पतली थीं ! मेरा शरीर थोडा भरा हुआ था ! हालांकि मैं इतनी मोटी नही थी पर बिट्टू भईया मुझे “मोटो” कहकर चिढाते थे ! मैं भी उनको “सुकडू” कहकर अपना बदला चुका लेती थी ! वो जब भी हमारे यहां आते तो मुझे बहुत प्यार करते थे ! मेरे लिए हमेशा कोई न कोई उपहार लेकर आते !

छोटा कस्बा था ! सभी एक दूसरे से प्यार से रहते थे ! सभी एक दूसरे को जानते थे तथा दुख सुख में बराबर शरीक होते थे ! भाई की कमी क्या होती है उस समय मालूम न था ! मैं छोटी थी ! मेरे लिए राखी का मतलब आस-पडौस के लडकों को राखी बांध देना और बदले में टाफी-चाकलेट और मिठाई आदि ले लेना भर था ! राखी बांधने के जो पैसे मिलते थे वो मां रख लेती थी ! थोडी सी बडी हुई तो सोचती थी कि अपना भी भाई होना चाहिए था ! फिर भी इस बात को लेकर कभी ज्यादा मलाल नहीं रहा ! हर राखी पर मां या बडी दीदी बिट्टू भईया को राखी डाक से भेज देतीं थीं ! जब भी हमारे घर से कोई कभी उनके घर जाता या उनके घर से कोई हमारे घर आता तो हमे राखी बांधने (डाक से भेजने) के बदले सूट या कोई अन्य उपहार मिल जाता था !

घर से कभी इस प्रकार इतने दिनो के लिए दूर नहीं रही थी ! पहली बार होस्टल में आई थी ! होस्टल की जिन्दगी भी एक अलग तरह की जिन्दगी होती है ! अपने घर से दूर ! मां-बाप से दूर ! अपनी निजी दुनिया से दूर ! जहां आपको अपने सभी काम खुद ही करने पडते हैं ! अपना ख्याल भी खुद ही रखना पडता है ! अपना भला-बुरा भी खुद ही समझना पडता है ! सम्भल गये तो ठीक वरना बिगडने में कोई देर नही लगती ! जहां आप अपने दिल की हर बात हर किसी से नहीं कह सकते ! सहेलियां थीं ! रूम-मेट भी थी ! लेकिन फिर भी ऐसा लगता था कि कहीं न कहीं कोई कमी है ! कोई चीज़ ऐसी है जो होनी चाहिए थी लेकिन है नहीं ! कोई अपना नहीं था ! कभी कभी दिल बहुत ही उदास हो जाता था ! दिल करता था सब कुछ छोड कर इस पिंजरे तो तोड कर भाग जाऊं ! फिर डाक्टर बनने के सपने के बारे में सोच कर मन मसोस कर रह जाती !

राखी का त्यौहार नज़दीक आ रहा था ! मां हर बार मुझे फोन पर बिट्टू भईया को राखी बांधने की हिदायत देना नहीं भूलती थीं ! साथ में उनकी मनपसन्द मिठाई ले जाने की ताकीद भी रहती थी ! मैं पहली बार बिट्टू भईया को राखी बांधने जा रही थी ! मैं पहली बार ‘अपने’ भाई को राखी बांधने जा रही थी ! मैं बहुत खुश थी ! बहुत उत्साहित थी ! जैसे कोई प्रतियोगिता जीतने जा रही होंऊ ! मन ही मन कई मनसूबे बनाती ! राखी कहां से लेनी है ! किस तरह की लेनी है ! उस पर क्या लगा होना चाहिए ! यदि कुछ लिखा हो तो क्या लिखा होना चाहिए ! फिर मिठाई में क्या लेना है ! मोतीचूर के लड्डू ! नहीं ! सोहन पापडी ! नहीं ! बंगाली रसगुल्ले ! नहीं…नहीं…नहीं ! काजू की बर्फी ! काजू… की… बर्फी ! हां…यह…. ठीक… है ! काजू की बर्फी ही ठीक रहेगी ! लेकिन काजू की बर्फी कहां से ली जाय ! यहां सबसे अच्छी दुकान कौन सी है ? किससे पूंछू ? मामी के घर में से तो किसी से भी नही पूछ्ना है ! उनको बताये बिना ही सरपराईज़ देना है भईया को ! बस बर्फी का डिब्बा और राखी का पैकेट लेकर चुन्नी से अपना सिर ढककर चुपचाप भईया के पास जाकर बैठ जाउंगी ! पहले प्लेट में थोडा सा पानी लेकर सिन्दूर और चावल को अच्छी तरह से मिक्स करके भईया को बडा सा तिलक लगाउंगी ! फिर सुन्दर सी राखी बांधूगी ! उसके साथ ही रेशम की डोरी बांध दूंगी ! भईया की लम्बी उम्र के लिए भगवान से प्रार्थना करूंगी ! उसके बाद डिब्बे में से बर्फी निकाल कर इकट्ठे चार-पांच टुकडियां भईया के मुंह में ठूस दूंगी !

राखी के एक दिन पहले क्लास से दो पीरियड मिस करके बाज़ार गई ! कई दुकाने घूमी ! कई तरह की राखियां देखी ! सबसे अच्छी लेने के चक्कर में तीन-चार घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला ! बहुत माथा पच्ची करने के बाद एक सुन्दर सी राखी खरीदी ! साथ में डिज़ाईनदार सफेद नगों वाली रेशम की डोरी ली ! सिन्दूर आदि की रेडीमेड प्लेट ली ! अपने रूम में पहुंची तो वारडन मैम का बुलावा आ गया ! इतनी देर होस्टल से गायब रहने के लिए खूब डांट पडी !

राखी खरीद कर मैं बहुत खुश थी ! कई बार लिफाफे में से निकाल कर निहार चुकी थी ! फिर निकालती फिर देखती और सहला कर रख देती ! मन भरता ही नहीं था ! कितनी सुन्दर लगेगी भईया की कलाई पर यह राखी ! कितने मजबूत होते हैं ये कच्चे धागे ! कितना प्यार, कितना विश्वास झलकता है इन रीति-रिवाजों में ! बहन-भाई के प्यार को दर्शाने वाला यह त्यौहार किसी ने बहुत सोच समझ कर बनाया होगा ! काजू की बर्फी कल सुबह ही लेनी पडेगी ! रात को लेकर रख ही नहीं सकती थी ! यह जो होने वाली डाक्टरनियां हैं न मेरी सहेलियां, इनको पता चल गया न कि मिठाई आई है तो पांच मिनट में पूरा डिब्बा खत्म ! भूखी हैं बिलकुल ! कल सुबह जल्दी उठना पडेगा ! नहा-धोकर राखी वगैरह लेकर काजू की बर्फी अच्छे से पैक करा के फिर बिट्टू भईया के घर जाऊंगी ! बिलकुल सुच्चे मुंह ! बिना कुछ खाये-पीये ! कहते हैं कि बहन को सुच्चे मुंह भाई को राखी बांधनी चाहिए ! सच्चे मन से भगवान से भाई की लम्बी उम्र की दुआ करनी चाहिए !

रात को बार बार नींद खुल जाती थी ! ठीक से सो ही नही पाई ! चिंता थी कि कहीं देर न हो जाय ! उठ उठ कर घडी देखती ! सुबह पांच बजे के बाद ऐसी घुरकी लगी कि सात बजे आंख खुली ! जल्दी जल्दी सब काम निपटाये ! नहा-धोकर नया सूट पहना ! निकलते निकलते नौ बज गए ! बहुत देर हो गई थी ! अभी बर्फी लेनी बाकी थी ! बाहर आई तो चारों तरफ भीड ही भीड थी ! कहीं कारों-बसों की चिल्ल पों तो कहीं स्कूटर-मोटर साईकिल की तेज रफ्तारी ! सभी लदे पडे थे ! सभी भाग रहे थे ! किसी के पास बात करने का भी समय नही था ! कोई बस, कोई रिक्शा, कोई आटो खाली नहीं था ! बहुत देर तक इंतज़ार करती रही ! बडी मुश्किल से एक टैक्सी मिली ! सुन्दर डिज़ाईन वाले डिब्बे में बर्फी का गिफ्ट पैक बनवाया ! भईया के घर जाने के लिए भागी भागी बस स्टाप पर आ गई ! जो भी बस आती सवारियों से लदी-पदी आती ! यहां से तो उनका घर बहुत दूर है ! टैक्सी तो बहुत मंहगी पडेगी ! लेकिन कोई टैक्सी भी दिखाई नहीं दे रही ! सौभाग्य से एक बस स्टाप पर आकर रूकी ! बडी मुश्किल से पायदान पर पैर रखने की जगह बना पाई ! बस से उतर कर दौडती-दौडती मामी के घर पंहुची ! घर पहुंच कर पता लगा कि भईया तो कब के शो-रूम में चले गए हैं ! सारी मेहनत, सारी दौडधूप, सारी तैयारियां बेकार ! लेकिन नहीं आज तो राखी है ! फिर तो यह त्यौहार एक साल बाद ही आयेगा ! और मैं तो भईया को पहली बार राखी बांधने जा रही थी ! अपने भईया को ! कोई बात नहीं ! मैं शो-रूम में जाकर ही राखी बांध दूंगी ! लेकिन शो-रूम तक जाने में लगभग दो घंटे लग जायेंगें ! दो बसे बदलनी पडेंगीं ! परवाह नहीं ! उठ कर चल दी ! मामी और भाभी रोकते-बुलाते रहे ! पर मैं न रूकी ! रूकी तो भैया के शो-रूम में जाकर !

शो-रूम में पहुंचते पहुंचते एक बज गया था ! सुबह से कुछ खाया पीया भी नहीं था ! भूख और भागदौड के कारण जान निकल रही थी ! लेकिन मैं अपनी मंज़िल पर पहुंच गई थी ! भईया को राखी बांध कर फिर आराम से खाऊंगी ! प्यास भी बहुत लगी हुई थी ! भईया अपने आप ही कुछ खिला-पिला देंगें ! शो-रूम में रश था ! भईया और मामा जी काउंटर पर थे ! भईया बिल बना रहे थे मामा जी पैसे ले रहे थे ! सभी सेल्समैन अपने अपने काम में व्यस्त थे !

मैं मिठाई का डिब्बा और राखी लेकर भईया के पास काउंटर पर चली गई ! भईया ने एक बार मेरी तरफ देखा ! फिर काम में लग गए ! मैं वहीं पर खडी इंतज़ार करती रही ! दस-पंद्रह मिनट तक इंतज़ार करने के बाद मैंने भईया से कहा – “सारी भईया, देर हो गई ! असल में मैं पहले आपके घर गई थी ! लेकिन आप यहां आ गए थे ! बसों के धक्के खाते खाते आपके पास पहुंची हूं ! मैंने सुबह से कुछ खाया भी नहीं है ! आप थोडा टाईम निकाल कर पहले राखी बंधवा लो !”

भईया ने एक बार नज़र उठा कर मेरी ओर देखा ! हाथ से रूकने का इशारा किया और फिर बिल बनाने लग गए! बिल बनाकर मेरी ओर मुडे ! काउंटर पर रखा मेरे द्वारा लाया गया बर्फी का डिब्बा और राखी का पैकेट उठाकर काउंटर के नीचे एक तरफ रख दिया ! गल्ले में से कुछ सौ-सौ के नोट निकाल कर मेरी ओर बढा दिए ! मैं अवाक भईया को देखने लगी ! मेरा माथा घूम गया ! मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि मैं क्या करूं ! मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि मैं क्या कंहू ! मेरे आंसू बेकाबू हो रहे थे ! मेरा दिमाग काम ही नहीं कर रहा था ! मैं वहां पर खडी नहीं रह पा रही थी ! मैं एकदम से बाहर की ओर भागी ! मुझे नहीं पता कि मैं होस्टल कैसे पहुंची ! बस अपने कमरे में आकर बिस्तर में मुंह गडा कर बहुत रोई……बहुत रोई…..रोती रही…..रोती रही !

इस बात को आज 27 साल हो गए हैं ! उसके बाद मैं किसी की कलाई पर यह “कच्चे धागे” बांधने का साहस नहीं जुटा पाई !
राजेश मिश्रा, भेल्दी, छपरा, बिहार 

मंगलवार, 12 जुलाई 2011

प्रश्नचिह्न(?)

BIRTH AND DEATH
मार्क्स ने कहा था, “चर्च का पुजारी जानता है कि ईश्वर नहीं है, और अगर है भी तो चर्च में तो कभी नहीं आयेगा.”
मोहन ने यह पढा था और यह बात घर कर गयी थी उसके दिल में.
वह था भी कुछ असाधारण सा.बचपन से ही अत्यंत तीव्र बुद्धि वाला होते हुए भी वह अपनी कोई खास पहचान नहीं बना पाया था. ईश्वर के अस्तित्व के बारे में संदेह न जाने कब उसके दिल में उपजा था? उसके माता पिता भी कोई असाधारण व्यक्तित्व वाले नहीं थे. माँ को तो उसने प्रत्येक व्रत, उपवास करते देखा था.पिता भी रामचरितमानस, गीता और महाभारत का पारायण करते थे, पर व्रत, उपवासों में उनकी कोई खास आस्था नहीं दिखती थी. वे न कृष्ण जन्माष्ठमी के उत्सवों में कोई उत्साह दिखाते थे न राम नवमी के. सत्यनारायण की कथा भी बहुत खास अवसरों पर ही कराते देखा था, उसने अपने पिता को.पता नहीं माँ का दबाव नहीं रहता तो उसके पिता शायद वह भी नहीं कराते. सत्यनारायण कथा के बारे में स्वयं उसके विचार भी ज्यादा अच्छे नहीं थे. मंदिरों का ढोंग भी उसने देखा था.गाँव के मंदिर में पुजारी का चढावे की मात्रा के अनुसार आशीर्वाद और फूल का वितरण तो उसका जाना पहचाना था. पुस्तकों के शौकीन मोहन को वहाँ से भी कोई खास ऐसी चीज नहीं मिली थी,जिससे उसके विचारों में स्थिरता आती.
इंही अंतर्द्वंदों के बीच पलता मोहन एक बार अपने साथियों के साथ वाराणसी जा पहुँचा. विश्वनाथ मंदिर का महात्म्य और बावा विश्वनाथ के प्रभाव के बारे में बहुत कुछ सुन रखा था उसने.उसने तो यह भी पढा था कि काशी शिव के त्रिशूल पर बसी हुई नगरी है. विश्वामित्र ने भी ऋण चुकाने के लिए राजा हरिश्चंद्र को वहीं बिकने की सलाह दी थी.वह उस समय उच्च माध्यमिक विद्यालय का छात्र था .काशी दर्शन, गंगा स्नान के उल्लास के साथ ही साथ उसके मन का उत्साह मर गया था, जब उसने कदम रखा सुप्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर के प्रांगण में.वहाँ घृणित व्यापार के अतिरिक्त कुछ भी तो उसको नजर नहीं आया था. लूट लिया गया था मोहन अपने सखाओं के साथ उस मंदिर के अंदर. निकलवा लिए थे उन लोगों के सब पैसे उन ढोंगियों ने जो धर्म का ठेकेदार होने का दावा तो करते थे.पर शिकार करते थे धर्म की आड में उन भोले भाले इंसानों का जो इनको देवताओं से कम दर्जा नहीं देते थे. देखा था उस छोटी उम्र में भी उसने उस नग्न नृत्य को. दिल टूट गया था उसका.वे लोग किस तरह थोडे बचे पैसों में घर पहुँचे, भूल नहीं पाया मोहन उसको आज भी.
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मोहन बढता रहा और पढता रहा. पढता रहा और बढता रहा .अंतर्द्वंद भी जारी रहा. किस्मत ने ला पटका उसे एक कैथोलिक कालेज में इंटर की शिक्षा के लिए. उसके दिल को भा गया वहाँ का अनुशासन, वहाँ के चर्च से संबंधित लोगों की सेवा भावना.एक दिन वह जा पहुँचा उनके बडे़ चर्च में भी. उस समय वहाँ कोई नहीं था, एक चौकीदार के अतिरिक्त.सर्वत्र एक शान्ति व्याप्त थी और सामने था सूली पर इसा मसीह का शरीर.वह वहाँ बहुत देर तक बैठा रहा.बाद में उठा था वह वहाँ से विचारों में खोया हुआ. क्या ईश्वर यहाँ है? उसने वहाँ कोई भीड नहीं देखी. लोग थे नहीं, अतः किसी तरह के विचारों का आदान प्रदान, दान दक्षिणा इत्यादि भी नहीं देखा था उसने. उसको लगा कि यहाँ ईश्वर हों या न हों, पर शांत चित मनन तो किया जासकता है, प्रार्थना तो की जा सकती है.
यह मृग मरीचिका भी थोडे ही दिनों तक उसका साथ दे पायी. उसने देखा कि किस तरह लोगों को फुसला कर इसाई बनाया जा रहा है.किस तरह अन्य धर्मावलंबियों से घृणा की जा रही है.सरस्वती पूजा भी नहीं करने दिया गया था कालेज के छात्रावास में.बगल के मकान में सरस्वती पूजा का आयोजन करने वाले छात्रों को हवन कुंड के लिए रेत और पूजा के लिए फूल नहीं लेने दिये गये थे कालेज के प्रांगण से. वह यह सब देखता था और सोचता था, यह सब क्या है? आखिर क्यों है ऐसा?
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यह सब तो उसके पिछले यादों का अंश था. आज तो उसमे परिपक्वता आ गयी है. मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों में भी जाता रहा है वह. धार्मिक स्थलों में धर्म की आड़ लेकर जघन्य कारनामों की कहानियाँ भी सुन चुका है वह. इसी बीच उसकी नजर पडी थी मार्क्स के कथन पर और फिर हलचल मची थी उसके मस्तिष्क में..
आज वह खडा है इस छोटे शहर के एक मंदिर के पुजारी के सामने.यह भी एक संयोग ही है. वह बहुत दिनों बाद इस शहर मे आया है. प्राकृतिक सौंदर्य से अभी भी भरपूर है यह शहर. पहले भी आ चुका है वह इस शहर में, पर कुछ तो कIर्य की व्‍यस्तता और कुछ अपना आलस. वह इस शहर के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं प्राप्त कर सका था. इस बार समय भी अधिक था और काम भी कम. वह अपने एक पुराने मित्र से मिलने चला गया. बातों ही बातों में शहर के दर्शनीय स्थलों की चर्चा चल पडी. बात आकर अटकी शहर के एक प्राचीन मंदिर पर.वह मुस्कुराया. मित्र को उसके मुस्कुराहट का अर्थ तो मालूम था. फिर भी उसने अनुरोध किया मोहन से एक बार वहाँ तक जाने के लिये. मंदिर चूँकि एक पहाडी पर स्थित थी, मोहन को लगा प्राकृतिक सौंदर्य लाभ तो होगा ही. मंदिर काफी पुराना भी था. वह दूसरे ही दिन प्रातः बेला में मित्र के साथ मंदिर की ओर चल पडा. मंदिर तक पहुँचने के लिए छोटी घुमावदार सडक जंगली पेड पौधों और हरियाली भरे झाडियों के बीच थी. उसको यह देख कर अच्छा लग रहा था. ऊपर पहुँचते पहुँचते उसने देखा कि मजबूत दिवालों से घिरे हुए अहाते के बीच था वह मंदिर. इसकी बनावट इसे करीब चार सौ साल पुराना साबित कर रही थी.इसी बीच उसके कानों में सुमधुर भजन की सामुहिक आवाज आने लगी.उसकी जिज्ञासा बढी, क्योंकि आवाज बच्चों के सुकोमल कंठ से निकली हुई लग रही थी. मित्र से कुछ पूछना उसे उचित नहीं लगा और धीरे धीरे वह ऊपर आ गया.ऊपर चढते ही उसकी निगह उठी पुजारी की ओर.फिर देखा उसने सामने हीं छोटे छोटे बच्चों के समूह को भजन गान में लीन.मंत्र मुग्ध हो गया था वह. एक अहसास सा हुआ कि यहाँ अनाथाश्रम तो नहीं चलाया जा रहा है. पर माहौल तो वैसा नहीं लग रहा था. अनाथाश्रम के बच्चों के भयभीत चेहरे उसकी आँखों के सामने थे,पर यहाँ तो ऐसा कुछ भी नहीं था. बच्चों की आयु लगभग पाँच से आठ वर्ष के बीच लग रही थी.पहनावे में दीनता तो झलकती थी, पर हीनता का नामोनिशान नहीं था. उनके चेहरे प्रफुल्लित थे. उत्साह टपका पड रहा था उनके चेहरों से. फिर उनका वह शिक्षक और इस मंदिर का पुजारी. बहुत साधारण वेशभूषा थी उसकी भी, पर उसके चेहरे का तेज? मोहन तो चौंधिया सा गया.उसे लग रहा था कि किसी सम्मोहन जाल में फँस गया है वह.उसके आश्चर्य का एक कारण यह भी था कि मंदिर में प्रातः कालीन पूजा के बदले पुजारी बच्चों की शिक्षा में संलग्न था.पुजारी शायद उसके मित्र को पहचानता था.उसके मित्र ने जब पुजारी को अभिवादन किया तो उसकी जिज्ञासु निगाहें मोहन की ओर उठी.मित्र ने बताया कि मोहन उसका मित्र है और दूसरे शहर से आया है.जिज्ञासा बस मंदिर देखने चला आया है.
पुजारी जी ने कहा, “मेरी व्यस्तता तो आप देख ही रहे हैं.मैं तो थोडी देर बाद ही इनको समय दे सकता हूँ.तब तक आप ही इन्हें मंदिर दिखा दीजिये.
“जैसी आपकी आज्ञा.”मित्र बोला और उसको मंदिर के अंदर ले गया.
मंदिर में कोई खास विशेषता तो उसको दिखी नहीं,पर उसकी स्वच्छता मोहन को प्रभावित कर गयी.मंदिर का प्रांगण भी वैसा ही स्वच्छ था.मंदिर की परिक्रमा के दौरान उसने अपने मित्र से पूछा, “ये बच्चे किसके हैं?मंदिर के पुजारी इनको सबेरे सबेरे भजन कीर्तन में कैसे लगाये हुए हैं?”
मित्र बोला, “मोहन तुम्हें सुन कर आश्चर्य होगा कि ये बच्चें घरों में काम करने वाली दाइयों के हैं. इनके माता पिता के पास इतने पैसे तो होते नहीं कि इनकी पढाई का बोझ उठा सकें और सच पूछो तो इन बच्चों के पस इतना समय भी नहीं होता कि वे नियमित रूप से पाठशाला में पाँच छः घंटे बीता सकें. इनके माता पिता से अनुरोध करके किसी तरह समय निकलवा कर पुजारी जी ने इन बच्चों को शिक्षा मार्ग पर लगाया है. भजन के बाद एक धंटे की पढाई करके ये बच्चे अपने अपने घरों को लौट जायेंगे और अपने छोटे भाई बहनों की देख भाल करेंगे.इनकी माएँ जब घरों का काम करके लौटेंगी, तो ये फिर तीन घंटों के लिए यहाँ आ जायेंगे. बाद में अपने अपने घरों में जाकर आराम करेंगे और फिर अपने छोटे छोटे भाई बहनों की देखभाल. इन बच्चों के यहाँ से जाने के बाद पुजारी जी भगवान की पूजा अर्चना में लगेंगे. शाम को जिज्ञासु भक्तों की भीड में घिरे रहते हैं पुजारी जी.ज्ञान ध्यान की बातों के बीच पुजारी जी सबसे ज्यादा जोर देते हैं, दिखावे से दूर रह कर कर्तव्य पालन पर.पुजारी जी उन बातों की विशद व्याख्या भी करते हैं, जो मनुष्य को इंसान बना सके.उनका यह रूप बहुतों को खलता भी है. चढावे के अनुरूप आशीर्वाद न पाने का क्षोभ भी बहुतों को रहता है. पुजारी जी को इन सब कामों से हटाने के लिए बहुत प्रलोभन दिये गये हैं. धमकियाँ भी दी गयी हैं उन्हें. पर वे कहते हैं कि कार्य ही पूजा है और यही उनके भगवान ने भी उन्हें बताया है.
मोहन को लग रहा था कि वह कोई सपना देख रहा है. पुजारी जी के चेहरे का तेज तो उसने देखा ही था. पुजारी जी तो अभी भी उन बच्चों में व्यस्त थे, जब वह मंदिर की परिक्रमा करके लौटा. पुजारी जी से क्षमा याचना करके वह अपने मित्र के साथ लौट गया. रास्ते में वह सोच रहा था कि ईश्वर है और वह इन्हीं कर्तव्यनिष्ठ इंसानों के हृदय में निवास करता है. मोहन को लगा कि उसके हृदय में एक उजाला सा हो रहा है.