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मंगलवार, 10 नवंबर 2015

जरा संभलकर चलायें पटाके और ध्यान रखें दीये के जलने तक

पटाखे और दीये से जलने पर राज का घरेलु उपचार

पटाखों से खेलते हुए या दीये से आप या कोई और जल जाए तो थोड़े से प्राथमिक उपचार और समझदारी से आप न सिर्फ मरीज को आराम पहुंचा सकते हैं बल्कि किसी बड़े हादसे को भी टाल सकते हैं। इसलिए जले हुए भाग का इलाज तुरंत घरेलू नुस्‍खे अपनाकर करना चाहिए। आइए हम आपको बताते हैं कि जलने पर सबसे पहले क्‍या करें।
1. जले हुए हिस्‍से पर पेस्‍ट लगाने से जलन कम होती है।
2. जले हुए हिस्‍से पर सबसे पहले ठंडा पानी डालना चाहिए।
3. जले हुए हिस्‍से पर रुई नहीं लगानी चाहिए।
4. ज्‍यादा परेशानी होने पर फौरन डॉक्‍टर के पास जाना चाहिए।

जलने पर देखभाल

1. जलने पर सबसे पहले उस पर ठंडा पानी डालिए। अच्‍छा तो यह रहेगा कि जले हुए अंग पर नल को खुला छोड़ दें।
2. जलने पर जीवाणुरहित पट्टी लगाइए, पट्टी को हल्‍का-हल्‍का लगाइए जिसके कारण जली हुई त्‍वचा पर जलन न हो।
3. हल्‍दी का पानी जले हुए हिस्‍से पर लगाना चाहिए। इससे दर्द कम होता है और आराम मिलता है।
4. कच्‍चा आलू बारीक पीसकर लगाने से भी फायदा होता है।
5. तुलसी के पत्‍तों का रस जले हुए हिस्‍से पर लगाएं, इससे जले वाले भाग पर दाग होने की संभावना कम होती है।
6. शहद में त्रिफला चूर्ण मिलाकर लगाने से चकत्‍तों को आराम मिलता है।
7. तिल को पीस‍कर लगाइए, इससे जलन और दर्द नहीं होगा। तिल लगाने से जलने वाले हिस्‍से पर पडे दाग-धब्‍बे भी समाप्‍त होते हैं।
8. गाजर को पीसकर जले हुए हिस्‍से पर लगाने से आराम मिलता है।
9. जलने पर नारियल का तेल लगाएं। इससे जलन कम होगी और आराम मिलेगा।

जलने पर क्‍या ना करें

1. जलने पर जले हुए हिस्‍से पर बर्फ की सेंकाई मत कीजिए। जले हुए हिस्‍से पर बर्फ लगाने से फफोले पडने की ज्‍यादा संभावना होती है।
2. जले हुए जगह पर रूई मत लगाइए, क्‍योंकि रूई जले हुए हिस्‍से पर चिपक सकती है जिसके कारण जलन होती है।
3. जले हुए मरीज को एक साथ पानी मत दीजिए, बल्कि ओआरएस का घोल पिलाइए। क्‍योंकि जलने के बाद आदमी की आंत काम करना बंद कर देती है और पानी सांस नली में फंस सकता है जो कि जानलेवा हो सकता है।
4. जले हुए हिस्‍से पर मरहम या मलाई बिलकुल ही मत लगाइए। इससे इंफेक्‍शन हो सकता है।
कोशिश यह कीजिए कि जलने वाले हिस्‍से पर फफोले न पडें। क्‍योंकि फफोले पडने से संक्रमण होने का खतरा ज्‍यादा होता है।

मंगलवार, 1 सितंबर 2015

क्या ये राज जानते हैं....

कड़वा है मगर सच है
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1. शेर दिन में 20 घन्टे सोता है अगर मेहनत सफलता की कुंजी होती तो गधे
जंगल के राजा होते।
2. कोई आपको धोखा दें यह उसकी गलती है
वही इन्सान अगर आपको दोबारा धोखा दे तो यह आपकी गलती है।
3. अच्छी जिन्दगी जीने के दो ही तरीके है
जो पसन्द है उसे हासिल कर लो
जो हासिल है उसे पसन्द करना सीख लो।
4. दुनिया की सबसे सस्ती चीज है सलाह
एक से माँगो हजारो से मिलती है
और सबसे मँहगा है सहयोग
हजारो से माँगो एक से मिलता है
5. कठीन समय मे समझदार व्यक्ति रास्ता खोजता है ओर कायर बहाना।
6. झुकता वही है जिसमें जान सोती है
अकडना तो लाश की पहचान होती है।
7. जिसने खरचा (व्यय) कम करने की बात सोची
समझ लो उसने कमाने की अक्ल खो दी।
8. हीरे की काबलियत रखते हो तो अंधेरो में चमका करो
रोशनी में तो काँच भी चमकते है।
9. अपने होसले को ये मत बताओ की तुम्हारी तकलीफ कितनी. बडी है
अपनी तकलीफ को बताओ की तुम्हारा होंसला कितना बडा है।
10. जिंदगी मे जो हम चाहते है वो आसानी से नही मिलता
लेकिन जिँदगी का सच ये है की
हम भी वही चाहते है
जो आसान नही होता।
11. आप चाहे कितने भी अच्छे काम करो
या कितने भी इमानदार बनो.,..
पर दुनिया तो आपकी एक गलती का इन्तजार कर रही है।
12. खुश हूं और सबको खुश रखता हुँ
लापरवाह हुँ फिर भी सबकी परवाह करता हुँ
मालुम है कोई मोल नही मेंरा
फिर भी अनमोल लोगो से रिस्ता रखता हूं.

प्रस्तुति : राजेश मिश्रा 

सोमवार, 6 जुलाई 2015

दीदी तीन... जीजा पांच

मजेदार कहानी

आज आपको एक कथा सुनाने का मन हो रहा है। एक गांव में बलभद्दर (बलभद्र) रहते थे। क्या कहा...किस गांव में? आप लोगों की बस यही खराब आदत है...बात पूछेंगे, बात की जड़ पूछेंगे और बात की फुनगी पूछेंगे। तो चलिए, आपको सिलसिलेवार कथा सुनाता हूं। ऐसा हो सके, इसलिए एक पात्र मैं भी बन जाता हूं। ...तो मेरे गांव में एक बलभद्दर रहते थे। अब आप यह मत पूछिएगा कि मेरा गांव कहां है? मेरा गांव कोलकाता में हो सकता है, लखनऊ में हो सकता है, आगरा में हो सकता है, पंजाब के किसी दूर-दराज इलाके में भी हो सकता है। कहने का मतलब यह है कि मेरा गांव हिंदुस्तान के किसी कोने में हो सकता है, अब यह आप पर निभज़्र है कि आप इसे कहां का समझते हैं।

तो बात यह हो रही थी कि मेरे गांव में एक बलभद्दर रहते थे। उसी गांव में रहते थे छेदी नाऊ। तब मैं उन्हें इसी नाम से जानता था। उस समय मैं यह भी नहीं जानता था कि 'छेदी बड़का दादा' (पिता के बड़े भाई) यदि शहर में होते तो छेदी सविता कहे जाते। उन दिनों जातीयता का विष इस कदर समाज में नहीं व्याप्त था। तब ब्राह्मण, ठाकुर, पासी, कुम्हार, चमार आदि जातियों में जन्म लेने के बावजूद लोग एक सामाजिक रिश्ते में बंधे रहते थे। तो कहने का मतलब यह था कि छेदी जाति के नाऊ होने के बावजूद गांव किसी के भाई थे, तो किसी के चाचा। किसी के मामा, तो किसी के भतीजा। हर व्यक्ति उनसे अपने रिश्ते के अनुसार व्यवहार करता था। छेदी बड़का दादा को तब यह अधिकार था कि वे किसी भी बच्चे को शरारत करते देखकर उसके कान उमेठ सकें। कई बार वे मुझे भी यह कहते हुए दो कंटाप जड़ चुके थे, 'आने दो पंडित काका को, तुम्हारी शिकायत करता हूं।' पंडित काका बोले, तो मेरे बाबा जी। हां, तो बात चल रही थी बलभद्दर की और बीच में कूद पड़े छेदी। बात दरअसल यह थी कि एक दिन भांग के नशे में यह कथा छेदी बड़का दादा ने मुझे सुनाई थी। और अब कागभुसुंडि की तरह यह कथा मैं आपको सुना रहा हूं।

हां, तो बात यह थी कि मेरे गांव में एक बलभद्दर रहते थे। उनका एक बेटा था श्याम सुंदर। बाइस साल की उम्र हुई, तो उसे लड़की वाले देखने आये और एक जगह बात तय हो गयी। बात तय होने की देर थी कि बर-बरीच्छा, तिलक आदि कायज़्क्रम भी जल्दी-जल्दी निपटा दिए गए। उन दिनों आज की तरह लड़के का कमाऊपन तो देखा नहीं जाता था। बस, लड़के की सामाजिक हैसियत, जमीन-जायदाद और घर का इतिहास देखा जाता था। आज की तरह लड़कियों को दिखाने का भी चलन नहीं था। तो साहब, मेरे गांव में जो बलभद्दर रहते थे, उनके बेटे के विवाह का दिन आ पहुंचा। आप लोगों को शायद यह पता ही हो कि आज से तीन-तीन साढ़े तीन दशक पहले तक शादी-ब्याह, तिलक, मुंडन, जनेऊ आदि जैसे समारोहों में नाऊ की क्या अहमियत होती थी। शादी के दिन सुबह से ही छेदी की खोज होने लगी थी। दूल्हे की मां कई बार चिरौरी कर चुकी थी, 'भइया छेदी, देखना समधियाने में कोई बात बिगड़ न जाये। मेरा लड़का तो बुद्धू है। तुम जानकार आदमी हो, सज्ञान हो। तुम्ही लाज रखना।'छेदी ने गुड़ का बड़ा सा टुकड़ा मुंह में डालते हुए कहा, 'काकी, तुम चिंता मत करो। मैं हूं न।'

छेदी बड़का दादा की बुद्धि का लोहा सचमुच लोग मानते थे। अगर पिछले एकाध दशक की बात छोड़ दी जाए, तो पंडित और नाऊ को बड़ा हाजिर जवाब और चतुर माना जाता था। छेदी वाकई थे चतुर सुजान। उनकी बुद्धि की एक मिसाल आपके सामने रखता हूं। उन दिनों मैं लखनऊ में पांचवीं में पढ़ता था। गमीज़् की छुट्टियों में गांव जाता था। एक दिन मेरे छोटे भाई के बाल छेदी बड़का दादा काट रहे थे और उनके आगे मैं अपना ज्ञान बघार रहा था, 'बड़का दादा...आपको मालूम है, सूयज़् के चारों ओर पृथ्वी चक्कर लगाती है और पृथ्वी का चक्कर चंद्रमा लगाता है।'

मेरे इतना कहते ही छेदी बड़का दादा खिलखिलाकर हंस पड़े, 'तुम्हारा पढऩा-लिखना सब बेकार है। यह बताओ गधेराम...अगर पृथ्वी सूरज महाराज का चक्कर लगाती है, तो हम सब लोगों को मालूम क्यों नहीं होता। अगर ऐसा होता, तो अब तक चलते-चलते हम लोग किसी गड्ढे में गिर गए होते। हमारे घर-दुवार किसी ताल-तलैया में समा गए होते।'
उनकी इस बात का जवाब तब मेरे पास नहीं था। मैं लाख तकज़् देता रहा, लेकिन वहां बैठे लोग छेदी नाऊ का ही समथज़्न करते रहे। तब सचमुच सापेक्षता का सिद्धांत नहीं जानता था या यों कहो कि ट्रेन में बैठने पर खिड़की से देखने पर पेड़ों के भागने का उदाहरण नहीं सूझा था। खैर...।

बात कुछ इस तरह हो रही थी कि मेरे गांव में जो बलभद्दर रहते थे, उनके बेटे श्याम सुंदर की बारात दो घंटे लेट से ही सही दुल्हन के दरवाजे पहुंच गयी। थोड़े बहुत हो-हल्ला के बाद द्वारपूजा, फेरों आदि का कायज़्क्रम भी निपट गया। इस झमेले में दूल्हा और छेदी काफी थक गए थे। लेकिन मजाल है कि छेदी ने दूल्हे का साथ एक पल को भी छोड़ा हो। वैसे भी उन दिनों दूल्हे के साये की तरह लगा रहना नाऊ का परम कतज़्व्य माना जाता था। इसका कारण यह है कि तब के दूल्हे 'चुगद' हुआ करते थे। ससुराल पहुंचते ही वे साले-सालियों से 'चांय-चांय' नहीं किया करते थे। साले-सालियों से खुलते-खुलते दो-तीन साल लग जाते थे। हां, तो आंखें मिचमिचाते छेदी दूल्हे के हमसाया बने उसके आगे-पीछे फिर रहे थे। सुबह के चार बजे हल्ला हुआ, 'दूल्हे को कोहबर के लिए भेजो।' यह गुहार सुनते ही छेदी चौंक उठे। थोड़ी देर पहले ही दूल्हे के साथ उन्होंने झपकी ली थी। लेकिन बलभद्दर ने जैसे ही दूल्हे से कहा, 'भइया, चलो उठो। कोहबर के लिए तुम्हारा बुलावा आया है।'

छेदी ने जमुहाई लेते हुए दूल्हे के सिर पर रखा जाने वाला 'मौर' उठा लिया और बोले, 'श्याम भइया, चलो।'

जनवासे से पालकी में सवार दूल्हे के साथ-साथ पैदल चलते छेदी नाऊ उन्हें समझाते जा रहे थे, 'भइया, शरमाना नहीं। सालियां हंसी-ठिठोली करेंगी, तो उन्हें कराज़् जवाब देना। अपने गांव-जंवार की नाक नहीं कटनी चाहिए। लोग यह न समझें कि दूल्हा बुद्धू है।'

पालकी में घबराये से दूल्हे राजा बार-बार यही पूछ रहे थे, 'कोहबर में क्या होता है, छेदी भाई। तुम तो अब तक न जाने कितने दूल्हों को कोहबर में पहुंचा चुके हो। तुम्हें तो कोहबर का राई-रत्ती मालूम होगा।'

'कुछ खास नहीं होता, भइया। हिम्मत रखो और करेज़् से जवाब दो। तो सालियां किनारे नहीं आयेंगी।' छेदी दूल्हे को सांत्वना दे रहे थे। तब तक पालकी दरवाजे तक पहुंच चुकी थी। पालकी से उतरकर दूल्हा सीधा कोहबर में चला गया और छेदी कोहबर वाले कमरे के दरवाजे पर आ डटे। घंटा भर लगा कोहबर के कायज़्क्रम से निपटने में। इसके बाद दूल्हे को एक बड़े से कमरे में बिठा दिया गया। रिश्ते-नाते सहित गांव भर की महिलाएं और लड़कियां दूल्हे के इदज़्-गिदज़् आकर बैठ गयीं। लड़कियां हंस-हंसकर दूल्हे से चुहुल कर रही थीं। उनके नैन बाणों से श्याम सुंदर लहूलुहान हो रहे थे। कुछ प्रौढ़ महिलाएं लड़कियों की शरारत पर मंद-मंद मुस्कुरा रही थीं। तभी एक प्रौढ़ महिला ने दूल्हे से पूछा, 'भइया, तुम्हारे खेती कितनी है?'

सवाल सुनकर भी दूल्हा तो सालियों के नैन में उलझा रहा लेकिन छेदी नाऊ सतकज़् हो गए। उन्हें याद आया कि चलते समय काका ने कहा था, बेटा बढ़ा-चढ़ाकर बताना। सो, उन्होंने झट से कहा, ' बयालिस बीघे....' दूल्हा यह सुनकर प्रसन्न हो गया। मन ही मन बोला, 'जियो प_े! तूने गांव की इज्जत रख ली।'

इसके बाद दूसरी महिला ने बात आगे बढ़ाई, 'दूल्हे के चाचा-ताऊ कितने हैं?'रेडीमेड जवाब तैयार था छेदी नाऊ के पास, 'वैसे चाचा तो दो हैं, लेकिन चाचियां चार।'

यह जवाब भी सुनकर दूल्हा मगन रहा। वह अपनी सबसे छोटी साली को नजर भरकर देखने के बाद फिर मन ही मन बोला, 'जियो छेदी भाई...क्या तीर मारा है।'

पहली वाली महिला ने ब्रह्मास्त्र चलाया, 'और बुआ?'

छेदी ने एक बार फिर तुक्का भिड़ाया, 'बुआ तो दो हैं, लेकिन फूफा साढ़े चार।' यह सवाल सुनते ही दूल्हा कुनमुना उठा। दूल्हे ने अपना ध्यान चल रहे वातालज़प पर केंद्रित किया और निगाहों ही निगाहों में उसे उलाहना दी, 'अबे क्या बक रहा है?' लेकिन बात पिता के बहिन की थी, सो उसने सिफज़् उलाहने से ही काम चला लिया। तभी छेदी बड़का दादा भी सवाल दाग बैठे, 'और भउजी के कितनी बहिनी हैं?'

वहां मौजूद महिलाएं चौंक गयीं। एक सुमुखी और गौरांगी चंचला ने मचलते हुए पूछ लिया, 'कौन भउजी?'

छेदी के श्यामवणज़् मुख पर श्वेत दंतावलि चमक उठी, 'अपने श्याम सुंदर भइया की मेहरारू...हमार भउजी...।' इस बार दूल्हे ने प्रशंसात्मक नजरों से छेदी को देखा। दोनों में नजर मिलते ही छेदी की छाती गवज़् से फूल गयी, मानो कह रहे हों, 'देखा...किस तरह इन लोगों को लपेटे में लिया।'

सुमुखी गौरांगी चंचला ने इठलाते हुए कहा, 'चार...जिसमें से एक की ही शादी हुई है...तुम्हारे भइया के साथ।'

तभी एक दूसरी श्यामवणीज़् बाला ने नाखून कुतरते हुए पूछ लिया,'जीजा जी के कितनी बहिनी हैं।'

छेदी के मुंह से एकाएक निकला, 'दीदी तो तीन, लेकिन जीजा पांच।' इधर छेदी के मुंह से यह वाक्य पूरा भी नहीं हो पाया था कि दूल्हा यानी श्याम सुंदर अपनी जगह से उछला और छेदी पर पिल पड़ा, 'तेरी तो...' इसके बाद क्या हुआ होगा। इसकी आप ही कल्पना कर सकते हैं। मुझे इसके बारे में कुछ नहीं कहना है, कोई टिप्पणी नहीं करनी है। हां, मुझे छेदी बड़का दादा का यह समीकरण न तो उस समय समझ में आया था और न अब समझ में आया है। अगर आप में से कोई इस समीकरण को सुलझा सके तो कृपा करके मुझे भी बताए कि जब श्याम सुंदर के दीदी तीन थीं, तो जीजा पांच कैसे हो सकते हैं।


इस व्यंग्य के लेखक अशोक मिश्र  अखबार हम वतन के स्थानीय संपादक हैं. ये अमर उजाला, दैनिक जागरण समेत की अखबारों में काम कर चुके हैं. इनका एक व्यंग्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है और इन दिनों एक उपन्यास के लेखन में व्यस्त हैं.

मंगलवार, 30 जून 2015

मास्टरजी को वरुणदेव ने जब सन्नी लियोन से मिलाया

भोलेभाले टीचर्स को समर्पित

(अगर आप किसी कारणवश चिंतित, व्याकुल, परेशान हैं तो पूरी कहानी अवश्य पढ़ें... आपको कहानी तरोताज़ा कर देगी और पुरे दिन ताज़गी बनी  रहेगी....राजेश मिश्रा))

गुरूजी विद्यालय से घर लौट रहे थे ।
रास्ते में एक नदी पड़ती थी ।
नदी पार करने लगे तो ना जाने क्या सूझा , एक पत्थर पर बैठ अपने झोले में से पेन और कागज
निकाल अपने वेतन का हिसाब निकालने लगे ।
अचानक….. हाथ से पेन फिसला और डुबुक …. पानी में डूब गया । गुरूजी परेशान । आज ही सुबह पूरे पांच रूपये खर्च कर खरीदा था। कातर दृष्टि से कभी इधर कभी उधर देखते , पानी में उतरने का प्रयास करते , फिर डर कर कदम खींच लेते ।
एकदम नया पेन था , छोड़ कर जाना भी मुनासिब न था ।
अचानक…….
पानी में एक तेज लहर उठी , और साक्षात् वरुण देव सामने थे । गुरूजी हक्के -बक्के ।
कुल्हाड़ी वाली कहानी याद आ गई ।

वरुण देव ने कहा , ”गुरूजी, क्यूँ इतने परेशान हैं । प्रमोशन , तबादला , वेतनवृद्धि ,क्या चाहिए ?
गुरूजी अचकचाकर बोले , ” प्रभु ! आज ही सुबह एक पेन खरीदा था । पूरे पांच रूपये का ।
देखो ढक्कन भी मेरे हाथ में है । यहाँ पत्थर पर बैठा लिख रहा था कि पानी में गिर गया
प्रभु बोले , ” बस इतनी सी बात ! अभी निकाल लाता हूँ ।”
प्रभु ने डुबकी लगाई , और चाँदी का एक चमचमाता पेन लेकर बाहर आ गए ।
बोले – ये है आपका पेन ?
गुरूजी बोले – ना प्रभु । मुझ गरीब को कहाँ ये चांदी का पेन नसीब । ये मेरा नाहीं ।
प्रभु बोले – कोई नहीं , एक डुबकी और लगाता हूँ डुबुक …..
इस बार प्रभु सोने का रत्न जडित पेन लेकर आये।
बोले – “लीजिये गुरूजी , अपना पेन ।”
गुरूजी बोले – ” क्यूँ मजाक करते हो प्रभु । इतना कीमती पेन और वो भी मेरा । मैं टीचर हूँ सर,
मंत्री का चेला  नहीं ।
थके हारे प्रभु ने कहा , ” चिंता ना करो गुरुदेव। अबके फाइनल डुबकी होगी ।
डुबुक ….
बड़ी देर बाद प्रभु उपर आये । हाथ में गुरूजी का जेल पेन लेकर ।
बोले – ये है क्या ? गुरूजी चिल्लाए – हाँ यही है , यही है ।
प्रभु ने कहा – आपकी इमानदारी ने मेरा दिल जीत लिया गुरूजी ।
आप सच्चे गुरु हैं । आप ये तीनों पेन ले लो ।
गुरूजी ख़ुशी – ख़ुशी घर को चले ।
.
कहानी अभी बाकी है दोस्तों —राजेश मिश्रा

-
गुरूजी ने घर आते ही सारी कहानी पत्नी जी को सुनाई, चमचमाते हुवे कीमती पेन भी दिखाए ।
पत्नी को विश्वास ना हुआ , बोली तुम किसी बड़े अधिकारी का चुरा कर लाये हो ।
बहुत समझाने पर भी जब पत्नी जी ना मानी तो गुरूजी उसे घटना स्थल की ओर ले चले ।
दोनों उस पत्थर पर बैठे , गुरूजी ने बताना शुरू किया कि कैसे – कैसे सब हुवा पत्नी एक एक कड़ी को किसी शातिर पुलिसिये की तरह जोड़ रही थी कि अचानक …….डुबुक !!!
पत्नी का पैर फिसला , और वो गहरे पानी में समा गई ।
गुरूजी की आँखों के आगे तारे नाचने लगे । ये क्या हुआ ! जोर -जोर से रोने लगे ।
तभी अचानक ……
पानी में ऊँची ऊँची लहरें उठने लगी । नदी का सीना चीरकर साक्षात वरुण देव प्रकट हुए  ।
बोले – क्या हुआ गुरूजी ? अब क्यूँ रो रहे हो ?
गुरूजी ने रोते हुए सारी कहानी प्रभु को सुनाई।
प्रभु बोले – रोओ मत। धीरज रखो । मैं अभी आपकी पत्नी को निकाल कर लाता हूँ।
प्रभु ने डुबकी लगाईं ,
और …....
थोड़ी देर में
वो सनी लियोनी को लेकर प्रकट हुए ।
बोले –गुरूजी । क्या यही आपकी पत्नी जी है ??
गुरूजी ने एक क्षण सोचा, और चिल्लाए – हाँ यही है , यही है ।
अब चिल्लाने की बारी प्रभु की थी ।
बोले – दुष्ट मास्टर ।
टंच माल देखा तो नीयत बदल दी । ठहर तुझे श्राप देता हूँ ।
गुरूजी बोले – माफ़ करें प्रभु । मेरी कोई गलती नहीं ।
अगर मैं इसे मना करता तो आप अगली डुबकी में प्रियंका चोपड़ा को लाते ।
मैं फिर भी मना करता तो आप मेरी पत्नी को लाते ।
फिर आप खुश होकर तीनों मुझे दे देते ।
अब आप ही बताओ भगवन, इस महंगाई के जमाने में मैं तीन – तीन बीबीयाँ कैसे पालता ।
सो सोचा, सनी से ही काम चला लूँगा ।
और इस ठंड में आप भी डुबकियां लगा लगा कर थक गये होंगे ।
जाइये विश्राम करिए ।
छपाक … ?????
एक आवाज आई । प्रभु बेहोश होकर पानी में गिर गए थे ।
गुरूजी सनी का हाथ थामे सावधानीपूर्वक धीरे – धीरे नदी पार कर रहे थे ,,,
मुझे मालूम है पोस्ट अच्छी लगी कृपया पोस्ट लाइक करेँ
कहानी अच्छी लगी तो राजेश मिश्रा को आशीर्वाद कीजिये.... जय जय श्री राधे... जय माता दी. 

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

Mehandipur Balaji

Mehandipur Balaji

श्री मेंहदीपुर बालाजी



Sri Mehandipur Balaji Temple is situated in Dausa,Rajasthan.Basically Shri Mehandipur BalajiTemple is Lord Hanuman Ji's Temple.Long ago the image of Lord Balaji and that of Pret Raja (the King of spirits) appeared from the Arawali hills. Now people suffering from malignant spirits and black magic or spell get their relief when they make an appeal for relief to Shri Bhairav ji and Shri Pret Raj Sarkar who holds his court and awards punishment to the malignant spirits, ghosts, goblins, ghouls, evil eyed witches etc.Shrine of Balaji, Court of Pret Raja, Pooja griha, Bhairav ji temple and Ram Darbar are some of the spots worth seeing here.
Mehandipur Temple Main Gate : Photo By Rajesh Mishra

राजस्थान के सवाई माधोपुर और जयपुर की सीमा रेखा पर स्थित मेंहदीपुर कस्बे में बालाजी का एक अतिप्रसिद्ध तथा प्रख्यात मन्दिर है जिसे श्री मेंहदीपुर बालाजी मन्दिर के नाम से जाना जाता है। भूत प्रेतादि ऊपरी बाधाओं के निवारणार्थ यहां आने वालों का तांता लगा रहता है। तंत्र मंत्रादि ऊपरी शक्तियों से ग्रसित व्यक्ति भी यहां पर बिना दवा और तंत्र मंत्र के स्वस्थ होकर लौटते हैं । सम्पूर्ण भारत से आने वाले लगभग एक हजार रोगी और उनके स्वजन यहां नित्य ही डेरा डाले रहते हैं ।
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