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मंगलवार, 10 नवंबर 2015

जरा संभलकर चलायें पटाके और ध्यान रखें दीये के जलने तक

पटाखे और दीये से जलने पर राज का घरेलु उपचार

पटाखों से खेलते हुए या दीये से आप या कोई और जल जाए तो थोड़े से प्राथमिक उपचार और समझदारी से आप न सिर्फ मरीज को आराम पहुंचा सकते हैं बल्कि किसी बड़े हादसे को भी टाल सकते हैं। इसलिए जले हुए भाग का इलाज तुरंत घरेलू नुस्‍खे अपनाकर करना चाहिए। आइए हम आपको बताते हैं कि जलने पर सबसे पहले क्‍या करें।
1. जले हुए हिस्‍से पर पेस्‍ट लगाने से जलन कम होती है।
2. जले हुए हिस्‍से पर सबसे पहले ठंडा पानी डालना चाहिए।
3. जले हुए हिस्‍से पर रुई नहीं लगानी चाहिए।
4. ज्‍यादा परेशानी होने पर फौरन डॉक्‍टर के पास जाना चाहिए।

जलने पर देखभाल

1. जलने पर सबसे पहले उस पर ठंडा पानी डालिए। अच्‍छा तो यह रहेगा कि जले हुए अंग पर नल को खुला छोड़ दें।
2. जलने पर जीवाणुरहित पट्टी लगाइए, पट्टी को हल्‍का-हल्‍का लगाइए जिसके कारण जली हुई त्‍वचा पर जलन न हो।
3. हल्‍दी का पानी जले हुए हिस्‍से पर लगाना चाहिए। इससे दर्द कम होता है और आराम मिलता है।
4. कच्‍चा आलू बारीक पीसकर लगाने से भी फायदा होता है।
5. तुलसी के पत्‍तों का रस जले हुए हिस्‍से पर लगाएं, इससे जले वाले भाग पर दाग होने की संभावना कम होती है।
6. शहद में त्रिफला चूर्ण मिलाकर लगाने से चकत्‍तों को आराम मिलता है।
7. तिल को पीस‍कर लगाइए, इससे जलन और दर्द नहीं होगा। तिल लगाने से जलने वाले हिस्‍से पर पडे दाग-धब्‍बे भी समाप्‍त होते हैं।
8. गाजर को पीसकर जले हुए हिस्‍से पर लगाने से आराम मिलता है।
9. जलने पर नारियल का तेल लगाएं। इससे जलन कम होगी और आराम मिलेगा।

जलने पर क्‍या ना करें

1. जलने पर जले हुए हिस्‍से पर बर्फ की सेंकाई मत कीजिए। जले हुए हिस्‍से पर बर्फ लगाने से फफोले पडने की ज्‍यादा संभावना होती है।
2. जले हुए जगह पर रूई मत लगाइए, क्‍योंकि रूई जले हुए हिस्‍से पर चिपक सकती है जिसके कारण जलन होती है।
3. जले हुए मरीज को एक साथ पानी मत दीजिए, बल्कि ओआरएस का घोल पिलाइए। क्‍योंकि जलने के बाद आदमी की आंत काम करना बंद कर देती है और पानी सांस नली में फंस सकता है जो कि जानलेवा हो सकता है।
4. जले हुए हिस्‍से पर मरहम या मलाई बिलकुल ही मत लगाइए। इससे इंफेक्‍शन हो सकता है।
कोशिश यह कीजिए कि जलने वाले हिस्‍से पर फफोले न पडें। क्‍योंकि फफोले पडने से संक्रमण होने का खतरा ज्‍यादा होता है।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2011

मन की दिवाली



अब खत्म हो गयी है दिवाली,
मेरा मन है बड़ा खाली खाली।

फुलझड़ियाँ और पटाखे,
बच गई है बस अब राखे।
दीपों के लौ है सूने,
नभ ने भी आँखे मूँदे।

है रात बड़ी ये काली,
हर जगह है बस अँधियारी।

अब खत्म हो गयी है दिवाली।

बिन दीप बूझा मन का आँगन,
फिरता हूँ मै बंजारा बन,
क्या चाह रहा,क्या मिला नहीं,
है कौन बसा सब में कण कण?

हर फूल यहाँ है साथ मेरे,
पर मिला ना बाग का माली।

अब खत्म हो गयी है दिवाली।
आनंद,हर्ष अब ना रही,
गयी बीत घड़ी खोयी कही,
सो गया जहाँ अब शांत शांत,
मन मेरा फिर क्यों है अशांत,
चिंता जो मन ने पा ली।

अब खत्म हो गयी है दिवाली।

जग की दिवाली बीत गयी,
मेरे मन की दिवाली अभी नई,
कई दीप स्वप्न के थे सजाने,
रंगों से भरी रंगोली बनाने।

आत्म दीप प्रकाश की थी जरुरी,
दूर करने को मन की अँधियारी।

अब खत्म हो गयी है दिवाली।

दीपावली हऽ जिन्दगी, हर साँस हऽ दिया


इस दीवाली पर आपके लिये मनोज भावुक की एक भोजपुरी ग़ज़ल ले कर आये हैं। हर साँस के दीपक की तरह जीवन को प्रकाशित करने की कामना से परिपूर्ण इस रचना के साथ ही सभी कों दीपोत्सव की ढेरों शुभकामनाएँ। भावुक जी और कल्पना से भिखारी ठाकुर फेस्टिवल कार्यक्रम के दौरान कोलकाता प्रेस क्लब में भेंट भइल रहे... 


दीपावली हऽ जिन्दगी,  हर साँस हऽ दिया
अर्पित  हरेक  सांस  बा  तहरे बदे  पिया

सूरज त  साथ छोड़  देवे  सांझ  होत ही
हमदर्द बन के मन के मुताबिक  जरे दिया

आघात ना लगित त  लिखाइत ना ई ग़ज़ल
ऐ दोस्त! जख्म देलऽ तू, अब लेलऽ शुक्रिया

भीतर जवन भरल बा, ऊ तऽ दुख हऽ, पीर हऽ
अब के तरे कहीं भला  हम गजल इश्किया

तोहरा हिया में दर्द के सागर बसल बा का ?
कुछुओ  कहेलऽ तू  तऽ ऊ लागेला मर्सिया

कुछ बात एह गजल में समाइल ना, काहे कि
ओकरा मिलल  ना भाव के अनुरूप काफिया

ठंड़ा पड़ल एह  खून के खउले के  देर बा
‘भावुक’ हो एक दिन में सुधर जाई भेडिया

दीवाली की रात



सच की जीत,
इन्साफ की फतह,
हर आँगन में,
नूर की कतार,
ये रात, रोशनी का पैगाम लेकर आयी है,

दोस्ती का शगुन,
प्यार की वजह,
मन के अँधेरे भी,
आज दो उतार,
ये रात, रोशनी का पैगाम लेकर आयी है,

आओ अँधेरे मिटाएं,
सूनी-सूनी किन्हीं आँखों में,
सपने जलायें,
ये दीवाली यूं मनाएं -
हँसी की फुल्झड़ियाँ,
ख़ुशी की लड़ियाँ पिरोयें,
घर घर में बांटे,
उम्मीदों की बर्फी,
उमंगों से गलियों को जगमगायें,
जिन्दगी की शम्मा,
जहाँ बुझ रही है,
चिरागों का कारवाँ,
आओ वहाँ ले के जाएँ ।

सभी साथियों को दीवाली की हार्दिक शुभकामनाएं, आप सब अपने परिवार के साथ इस दीपोत्सव का भरपूर आनंद लें, जाते जाते एक शेर अर्ज है -



वो जल उठा,सरे-शाम ही चिरागे-हयात बनकर,

अंधेरो को मेरे घर की कभी टोह न मिली॥



शुभ दीपावली 

दिवाली पर कविताएँ


साथी, घर-घर आज दिवाली / हरिवंशराय बच्चन

साथी, घर-घर आज दिवाली!

फैल गयी दीपों की माला
मंदिर-मंदिर में उजियाला,
किंतु हमारे घर का, देखो, दर काला, दीवारें काली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!

हास उमंग हृदय में भर-भर
घूम रहा गृह-गृह पथ-पथ पर,
किंतु हमारे घर के अंदर डरा हुआ सूनापन खाली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!

आँख हमारी नभ-मंडल पर,
वही हमारा नीलम का घर,
दीप मालिका मना रही है रात हमारी तारोंवाली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!


‘दीवाली के दीप जले’ – रघुपति सहाय ‘फ़िराक़’ गोरखपुरी


कालजयी शायर रघुपति सहाय श्रीवास्तव ‘फ़िराक़’ गोरखपुरी की एक ग़ज़ल
दे रहा हूं जिसका शीर्षक हैः “दीवाली के दीप जले”। फ़िराक़ गोरखपुरी को उनकी
कृति ‘गुले-नग़मा’ के लिए १९६० में साहित्य अकादमी पुरस्कार और १९६९ में
ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
‘फ़िराक़’ गोरखपुरी
नई हुई फिर रस्म पुरानी दीवाली के दीप जले
शाम सुहानी रात सुहानी दीवाली के दीप जले
धरती का रस डोल रहा है दूर-दूर तक खेतों के
लहराये वो आंचल धानी दीवाली के दीप जले
नर्म लबों ने ज़बानें खोलीं फिर दुनिया से कहन को
बेवतनों की राम कहानी दीवाली के दीप जले
लाखों-लाखों दीपशिखाएं देती हैं चुपचाप आवाज़ें
लाख फ़साने एक कहानी दीवाली के दीप जले
निर्धन घरवालियां करेंगी आज लक्ष्मी की पूजा
यह उत्सव बेवा की कहानी दीवाली के दीप जले
लाखों आंसू में डूबा हुआ खुशहाली का त्योहार
कहता है दुःखभरी कहानी दीवाली के दीप जले
कितनी मंहगी हैं सब चीज़ें कितने सस्ते हैं आंसू
उफ़ ये गरानी ये अरजानी दीवाली के दीप जले
मेरे अंधेरे सूने दिल का ऐसे में कुछ हाल न पूछो
आज सखी दुनिया दीवानी दीवाली के दीप जले
तुझे खबर है आज रात को नूर की लरज़ा मौजों में
चोट उभर आई है पुरानी दीवाली के दीप जले
जलते चराग़ों में सज उठती भूके-नंगे भारत की
ये दुनिया जानी-पहचानी दीवाली के दीप जले
भारत की किस्मत सोती है झिलमिल-झिलमिल आंसुओं की
नील गगन ने चादर तानी दीवाली के दीप जले
देख रही हूं सीने में मैं दाग़े जिगर के चिराग लिये
रात की इस गंगा की रवानी दीवाली के दीप जले
जलते दीप रात के दिल में घाव लगाते जाते हैं
शब का चेहरा है नूरानी दीवाले के दीप जले
जुग-जुग से इस दुःखी देश में बन जाता है हर त्योहार
रंजोख़ुशी की खींचा-तानी दीवाली के दीप जले
रात गये जब इक-इक करके जलते दीये दम तोड़ेंगे
चमकेगी तेरे ग़म की निशानी दीवाली के दीप जले
जलते दीयों ने मचा रखा है आज की रात ऐसा अंधेर
चमक उठी दिल की वीरानी दीवाली के दीप जले
कितनी उमंगों का सीने में वक़्त ने पत्ता काट दिया
हाय ज़माने हाय जवानी दीवाली के दीप जले
लाखों चराग़ों से सुनकर भी आह ये रात अमावस की
तूने पराई पीर न जानी दीवाली के दीप जले
लाखों नयन-दीप जलते हैं तेरे मनाने को इस रात
ऐ किस्मत की रूठी रानी दीवाली के दीफ जले
ख़ुशहाली है शर्ते ज़िंदगी फिर क्यों दुनिया कहती है
धन-दौलत है आनी-जानी दीवाली के दीप जले
बरस-बरस के दिन भी कोई अशुभ बात करता है सखी
आंखों ने मेरी एक न मानी दीवाली के दीप जले
छेड़ के साज़े निशाते चिराग़ां आज फ़िराक़ सुनाता है
ग़म की कथा ख़ुशी की ज़बानी दीवाली के दीप जले


कहीं पर दिवाली-कहीं पर दिवाला

* सुरेन्द्र सिंह " झंझट " 


अँधेरे का चारों तरफ बोलबाला |
कहीं पर दिवाली-कहीं पर दिवाला |

     महंगाई ने है कमर तोड़ डाली
        गरीबों की थाली है रोटी से खाली
               है भ्रष्टों की चांदी-दलालों की चांदी
                    नेताओं ने भारत की लुटिया डुबा दी


घोटालों का खेल-कहीं खेल में घोटाला |
कहीं पर दिवाली - कहीं पर दिवाला |


पंचों-प्रधानों की लीला निराली
     इलेक्सन में सारी हदें तोड़ डाली
          वोटर ने भी खूब जमकर छकाया
                चला दाम-दारू औ मुर्गा उड़ाया

मगर वोट-नोटों की गड्डी में डाला |
कहीं पर दिवाली- कहीं पर दिवाला |

भाई की महफ़िल का क्या है नज़ारा
     चल जाती है गोली मिलते इशारा
            जगमग हवेली भला क्या कमी है
                  जुआ और इंग्लिश की महफ़िल जमी है

पुलिस-नेता-अफसर का संगम निराला |
कहीं पर दिवाली - कहीं पर दिवाला |

मिलावट-मिठाई है याकि जहर है
     चारों तरफ बस कहर ही कहर है
               धरम-जाति-वर्गों में हम सब बँटे हैं
                    कुर्सी के चक्कर में बड़के फँसे हैं

शहीदों के सपनों को ही बेंच डाला |
कहीं पर दिवाली - कहीं पर दिवाला |

देखो गरीबी में आटा है गीला
        बिना रंग डाले ही चेहरा है पीला
              समोखन के घर में न है एक पाई
                   लिया ब्याज पर तब दिवाली मनाई

बताओ भला है कहाँ पर उजाला ?
कहीं पर दिवाली-कहीं पर दिवाला